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भारत-चीन सीमा विवाद: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एक जटिल और ऐतिहासिक मुद्दा है। यह विवाद न केवल भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके पीछे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी गहरी है। तवांग, डोकलाम और मैकमोहन रेखा जैसे महत्वपूर्ण स्थानों के संदर्भ में, यह लेख इस विवाद की जड़ें और वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करता है। जानें कि कैसे ये घटनाएं एशिया की दो महाशक्तियों के बीच तनाव को बढ़ा रही हैं और भारत इस चुनौती का सामना कैसे कर रहा है।
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भारत-चीन सीमा विवाद: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति

भारत-चीन सीमा का जटिल इतिहास

जब हम पाकिस्तान की बात करते हैं, तो एलओसी का जिक्र होता है। लेकिन चीन के एलएएसी के संदर्भ में भ्रम क्यों उत्पन्न होता है? चीन का भारत से कोई सीधा सीमा नहीं है। फिर भी, इतिहास में ऐसी क्या घटनाएं हुईं कि चीन ने हमारे क्षेत्र में घुसपैठ की? अरुणाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों से लेकर भूटान के डोकलाम तक, यह सीमा केवल एक नक्शे पर खींची गई रेखा नहीं है। यह वह क्षेत्र है जहां एशिया की दो प्रमुख शक्तियां आमने-सामने हैं। चाहे तवांग पर चीन का दावा हो, डोकलाम में सैनिकों की टकराव हो या सीमा के निकट चीनी गांवों का निर्माण, हर घटना एक बड़े भू-राजनीतिक खेल की ओर इशारा करती है। सवाल यह है कि चीन की नजर इस क्षेत्र पर क्यों है और भारत इसका सामना कैसे कर रहा है?


विवाद का ऐतिहासिक संदर्भ

अरुणाचल प्रदेश की ऐतिहासिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि में तिब्बत, बर्मा और भूटान की संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट है। तवांग में 16वीं सदी में स्थापित बौद्ध मठ इसकी पहचान है। यह मठ तिब्बत के बौद्ध समुदाय के लिए पवित्र माना जाता है। प्राचीन काल में तिब्बत और भारतीय शासकों के बीच कोई विवाद नहीं था, और उन्होंने आपसी समन्वय से रहन-सहन किया। इसलिए, उन्होंने अरुणाचल और तिब्बत के बीच कोई निश्चित सीमा रेखा नहीं बनाई। लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में 'राष्ट्र-राज्य' की अवधारणा के साथ सीमाओं के निर्धारण की आवश्यकता महसूस की गई। उस समय भारत एक स्वतंत्र देश नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था। तवांग में बौद्ध मठ के कारण सीमाओं का निर्धारण शुरू हुआ, जिसके लिए 1914 में तिब्बत, चीन और ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों के बीच शिमला में एक बैठक हुई।


मैकमोहन रेखा का महत्व

1914 में, जब भारत पर ब्रिटिश शासन था, तिब्बत सरकार के साथ शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। ब्रिटिश सरकार के प्रशासक सर हेनरी मैकमोहन ने तिब्बत सरकार के प्रतिनिधि के साथ समझौता किया, जिसके कारण तिब्बत और भारत की सीमा को मैकमोहन रेखा कहा गया। लेकिन चीन ने तिब्बत को स्वायत्त नहीं मानते हुए इस समझौते को कभी स्वीकार नहीं किया। दूसरी ओर, भारत में मैकमोहन रेखा को दर्शाने वाला मानचित्र 1938 में प्रकाशित हुआ और तब से यह मान्य है।


विवाद की जड़ें

इस सम्मेलन में कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं रखा गया। केवल एक मानचित्र पर रेखाओं के माध्यम से आउटर तिब्बत को इनर तिब्बत और इनर तिब्बत को चीन से अलग किया गया। दो मानचित्र बनाए गए। पहला 27 अप्रैल 1914 को था, जिस पर चीन के प्रतिनिधि ने हस्ताक्षर किए। दूसरा मानचित्र 3 जुलाई 1914 को आया, जिसे चीन ने अस्वीकार कर दिया। भारत में मैकमोहन रेखा को दर्शाने वाला मानचित्र 1938 में प्रकाशित हुआ और तब से यह मान्य है।


डोकलाम संकट का विश्लेषण

16 जून 2017 को हिमालय की ठंडी हवा में कुछ सैनिक आमने-सामने खड़े थे। गोलियां नहीं चलीं, लेकिन स्थिति तनावपूर्ण थी। यह डोकलाम की कहानी है, जो भूटान, चीन और भारत के ट्राई जंक्शन के पास स्थित एक महत्वपूर्ण पठार है। चीन ने इस क्षेत्र पर कई वर्षों से दावा किया है, जबकि भूटान इसे अपनी भूमि मानता है। भारत के लिए यह केवल भूटान का मुद्दा नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न था। डोकलाम के दक्षिण में सिलीगुड़ी कॉरिडोर है, जिसे चिकन नेक भी कहा जाता है। 16 जून 2017 को चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने डोकलाम में सड़क निर्माण शुरू किया, जिसका भूटान ने विरोध किया। भारत ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया।


चीन की सीमा गांव रणनीति

चीन एलएसी के पास गांवों का निर्माण कर रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2021 में अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास तिब्बत के एक गांव का दौरा किया। भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनोज पांडे ने कहा कि सीमा पर चीन की तरफ कुछ क्षेत्रों में नए गांव स्थापित किए गए हैं। भारत ने अपनी अभियानगत रणनीति में इसका संज्ञान लिया है, क्योंकि ये आवास सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल हो सकते हैं।