भारत ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी में सफलता हासिल की
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलता
(दीक्षा राठौड़) अन्नापोलिस (अमेरिका), 14 सितंबर - एक अमेरिकी विश्लेषक ने बताया कि भारत ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलतापूर्वक मेज़बानी की। पहले दिन जारी व्यापक साझा घोषणा ने विभिन्न विचारों वाले देशों के बीच सहमति बनाने की भारत की क्षमता को उजागर किया। 'अटलांटिक काउंसिल' में दक्षिण एशिया मामलों के वरिष्ठ फेलो माइकल कुगेलमैन ने कहा कि यह घोषणा भारत की शिखर सम्मेलन आयोजित करने की क्षमता और ब्रिक्स समूह की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है। यह वार्षिक शिखर सम्मेलन 12 से 13 सितंबर तक नई दिल्ली में भारत की अध्यक्षता में आयोजित हुआ।
ब्रिक्स का महत्व
ब्रिक्स 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है, जो दुनिया की लगभग 49.5 प्रतिशत जनसंख्या और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इस शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सहित कई वैश्विक नेताओं ने भाग लिया।
घोषणापत्र की मुख्य बातें
घोषणापत्र में एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों में वृद्धि पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है, यह कहते हुए कि ऐसे कदम वैश्विक व्यापार को प्रभावित करते हैं और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसमें आतंकवाद, संघर्ष की रोकथाम और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर भी जोर दिया गया। इस घोषणापत्र को लेकर हुई वार्ताओं में भारत ने पश्चिम एशिया संघर्ष के संदर्भ में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच मतभेदों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत की भूमिका की सराहना
कुगेलमैन ने रविवार को 'पीटीआई वीडियो' से कहा, 'मेरा मानना है कि हम भारत की मेज़बानी की भूमिका को सफल मान सकते हैं। पहले दिन एक व्यापक साझा घोषणापत्र का जारी होना यह दर्शाता है कि भारत विभिन्न विचारों वाले देशों के समूह के साथ काम करने और सहमति बनाने में सफल रहा।' उन्होंने भारत की बढ़ती वैश्विक अहमियत की सराहना करते हुए कहा कि ब्रिक्स आम सहमति के आधार पर काम करता है, न कि पूर्ण सर्वसम्मति के आधार पर।
अमेरिका की दृष्टि
जब कुगेलमैन से पूछा गया कि अमेरिका इस शिखर सम्मेलन को किस दृष्टिकोण से देखता है, तो उन्होंने कहा कि अमेरिका में अक्सर ब्रिक्स को गलत तरीके से समझा जाता है। उन्होंने कहा, 'एक धारणा यह है कि यह अप्रासंगिक है, यह केवल बातचीत का मंच है। दूसरी धारणा यह है कि यह पश्चिमी देशों का मुकाबला करने के लिए बना है। ये दोनों ही बातें गलत हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से किसी कड़ी सार्वजनिक प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं है, क्योंकि घोषणापत्र में अमेरिका का विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया गया है।
