भारत में नागरिकों की पहचान पर उठते सवाल: मोहन भागवत का बयान
भारत के भीतर नागरिकों की पहचान पर सवाल
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कौन सी ताकतें भारत को आंतरिक रूप से कमजोर कर रही हैं? किस विदेशी शक्ति ने भारतीय नागरिकों को अपमानित किया है? किसने अपने ही देश के बुद्धिजीवियों, छात्रों और पत्रकारों को देशद्रोही करार दिया? क्या किसी विदेशी सरकार ने भारत के मतदाताओं को मतदाता सूचियों से हटाने का कार्य किया है? यह सब सवाल इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भारत में भारतीयों को संदिग्ध बनाने की राजनीति किसकी है?
क्या मोहन भागवत या संघ इस पर कोई स्पष्ट उत्तर दे सकते हैं? भागवत का कहना है कि विदेशी ताकतें भारत को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन यह सवाल उठता है कि पिछले चौदह वर्षों में भारतीय नागरिकों को तोड़ने और विभाजित करने का कार्य किसने किया है? क्या यह ट्रंप या पुतिन थे जिन्होंने भारत के असहमत नागरिकों को अपमानित किया?
यह मोदी सरकार की राजनीतिक संस्कृति का मुद्दा है, जिसमें नागरिक समूहों को कीड़ों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है जो 2014 से चल रही है। आज भारत का लोकतंत्र अपने नागरिकों के मताधिकार को छीन रहा है। चुनाव आयोग के अनुसार, लगभग 13.39 करोड़ मतदाता ड्राफ्ट सूचियों से बाहर हैं।
जब युवा भारतीय नौकरी और परीक्षा की अनियमितताओं पर आवाज उठाते हैं, तो उन्हें विदेशी साजिश का हिस्सा बताया जाता है। यदि वे सवाल पूछते हैं, तो उन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा जाता है। किसान आंदोलन करते हैं तो उन्हें आंदोलनजीवी करार दिया जाता है।
जब नागरिक तिरंगा लेकर प्रदर्शन करते हैं, तो उन्हें कानून तोड़ने वाला कहा जाता है। इस प्रकार, जब समाज में देशभक्त और देशद्रोही के बीच की रेखाएँ खींची जा रही हैं, तो क्या विदेशी शक्तियों को जिम्मेदार ठहराना उचित है? क्या देश के भीतर निर्णय लेने वालों की जवाबदेही नहीं होनी चाहिए?
2026 में भारत के नागरिकों की नीयत पर संदेह किया जा रहा है। मताधिकार की मांग करने वाले को अराजकतावादी समझा जा रहा है। मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी इस स्थिति का ठीकरा किस पर फोड़ रहे हैं? विदेशी साजिश पर!
