भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अद्वितीय नायक: 1857 से 20वीं सदी तक
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अद्वितीय इतिहास
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल एक आंदोलन या एक नेता की कहानी नहीं है। यह उन हजारों लोगों के साहस, त्याग और संघर्ष की गाथा है, जिन्होंने अलग-अलग समय और अलग-अलग तरीकों से ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी।
ब्रिटिश सरकार ने कभी 'सबसे खतरनाक भारतीयों' की कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं की। लेकिन सरकारी दस्तावेजों, मुकदमों, गिरफ्तारी अभियानों और कठोर सजाओं से यह स्पष्ट होता है कि कुछ स्वतंत्रता सेनानी ऐसे थे, जिन्हें अंग्रेज अपने शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे। किसी को पकड़ने के लिए हजारों सैनिक लगाए गए, किसी पर इनाम घोषित हुआ, किसी को काला पानी भेजा गया और किसी को फांसी पर चढ़ा दिया गया।
इस श्रृंखला के पहले भाग में हम ऐसे 8 स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी जानेंगे, जिन्होंने 1857 की क्रांति से लेकर 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों तक अंग्रेजी शासन की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1. मंगल पांडे: जिन्होंने अंग्रेजी शासन की नींद उड़ा दी
1857 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी को लगता था कि भारतीय सैनिक हमेशा उसके आदेश मानेंगे। लेकिन 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में सिपाही मंगल पांडे ने अंग्रेज अधिकारियों के खिलाफ हथियार उठा लिए। उस समय नई एनफील्ड राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी होने की बात फैल चुकी थी। इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों में नाराजगी थी। मंगल पांडे ने इस अपमान के खिलाफ विद्रोह किया।
हालांकि उन्हें जल्द गिरफ्तार कर 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई, लेकिन उनकी कार्रवाई ने पूरे उत्तर भारत में विद्रोह की चिंगारी जला दी। मेरठ, कानपुर, झांसी, दिल्ली और लखनऊ तक क्रांति फैल गई। अंग्रेजों को समझ आ गया था कि यदि भारतीय सैनिक विद्रोह कर दें, तो ब्रिटिश सेना का सबसे मजबूत आधार ही टूट जाएगा।
2. रानी लक्ष्मीबाई: जिन्होंने अंग्रेजों को बताया कि युद्ध केवल पुरुष नहीं लड़ते
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों की 'डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स' नीति की सबसे बड़ी विरोधी बनकर सामने आईं। अंग्रेजों ने उनके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर झांसी पर कब्जा करने की कोशिश की।
1857 के विद्रोह में रानी ने झांसी की रक्षा स्वयं की। उन्होंने महिलाओं और युवाओं को भी युद्ध के लिए तैयार किया। कालपी और ग्वालियर तक उन्होंने अंग्रेजी सेना का डटकर सामना किया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास युद्ध करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं। ब्रिटिश अधिकारी सर ह्यू रोज ने भी अपनी रिपोर्ट में रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की प्रशंसा की थी और उन्हें विद्रोह के सबसे सक्षम नेताओं में माना था।
3. तात्या टोपे: गुरिल्ला युद्ध के उस्ताद
1857 की क्रांति दबने के बाद अधिकांश नेता या तो शहीद हो चुके थे या गिरफ्तार हो गए थे। लेकिन तात्या टोपे ने हार नहीं मानी। उन्होंने लगभग एक वर्ष तक मध्य भारत, राजस्थान और दक्कन के इलाकों में गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। वे लगातार स्थान बदलते रहे और अंग्रेजी सेना को भ्रमित करते रहे।
इतिहास में दर्ज है कि कई बार अंग्रेजी सेना उनके पीछे पहुंची, लेकिन तात्या टोपे अपने साथियों के साथ वहां से निकल चुके थे। इस कारण अंग्रेजों को बार-बार नई रणनीति बनानी पड़ी। आखिरकार विश्वासघात के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और 1859 में फांसी दे दी गई।
4. कुंवर सिंह: 80 वर्ष की आयु में भी अंग्रेजों के लिए चुनौती
जब अधिकांश लोग वृद्धावस्था में आराम करते हैं, तब बिहार के जगदीशपुर के राजा कुंवर सिंह ने 1857 के विद्रोह का नेतृत्व किया। लगभग 80 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सेना संगठित की और कई लड़ाइयों में भाग लिया।
एक युद्ध के दौरान उनके हाथ में गोली लगी। कहा जाता है कि संक्रमण फैलने से बचाने के लिए उन्होंने घायल हाथ को स्वयं काटकर गंगा नदी को समर्पित कर दिया। यह घटना आज भी उनके साहस का प्रतीक मानी जाती है।
5. बेगम हजरत महल: अवध की वह शासक जिसने अंग्रेजों के सामने झुकने से इनकार कर दिया
1856 में अंग्रेजों ने अवध का विलय कर लिया। इसके बाद 1857 के विद्रोह में बेगम हजरत महल ने लखनऊ में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला। उन्होंने अपने पुत्र बिरजिस कद्र को शासक घोषित किया और अंग्रेजों के खिलाफ जनता को संगठित किया।
जब अंग्रेजों ने लखनऊ पर दोबारा कब्जा कर लिया, तब भी बेगम हजरत महल ने आत्मसमर्पण नहीं किया और अंततः नेपाल चली गईं।
6. वासुदेव बलवंत फड़के: जिन्होंने संगठित सशस्त्र क्रांति का सपना देखा
1857 के बाद कुछ समय तक अंग्रेजों को लगा कि बड़ा विद्रोह अब नहीं होगा, लेकिन महाराष्ट्र के वासुदेव बलवंत फड़के ने इस धारणा को तोड़ दिया। उन्होंने किसानों, मजदूरों और वंचित समुदायों को संगठित कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र अभियान चलाया। धन जुटाने के लिए सरकारी खजानों और समर्थक जमींदारों को निशाना बनाया गया।
फड़के ने पहली बार यह विचार मजबूत किया कि स्वतंत्रता के लिए एक संगठित क्रांतिकारी संगठन बनाया जा सकता है। 1883 में जेल में ही उनका निधन हो गया।
7. चापेकर बंधु: जिनकी कार्रवाई से अंग्रेजों में मच गया था डर
दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव चापेकर तीनों भाई पुणे के रहने वाले थे। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू. सी. रैंड के नेतृत्व में लोगों के घरों में जबरन तलाशी और महिलाओं के साथ अपमानजनक व्यवहार की शिकायतें सामने आईं। इससे नाराज होकर दामोदर और बालकृष्ण चापेकर ने रैंड और लेफ्टिनेंट आयर्स्ट पर हमला किया। रैंड की बाद में मृत्यु हो गई।
इस घटना के बाद अंग्रेजी सरकार ने पूरे महाराष्ट्र में व्यापक गिरफ्तारी अभियान चलाया। तीनों भाइयों को अलग-अलग मुकदमों में फांसी की सजा दी गई।
यह पहली बार था जब किसी ब्रिटिश अधिकारी को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया गया और इससे युवाओं में क्रांतिकारी भावना तेज हुई।
8. विनायक दामोदर सावरकर: विचारों और संगठन से चुनौती
सावरकर ने केवल लेखन ही नहीं किया, बल्कि लंदन में रहकर भारतीय क्रांतिकारियों को संगठित करने का भी प्रयास किया। उन्होंने 1857 के विद्रोह को भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया। यह विचार ब्रिटिश इतिहास लेखन के बिल्कुल विपरीत था। 1909 में उनकी गिरफ्तारी हुई। उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा देकर अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया, जिसे 'काला पानी' कहा जाता था।
1857 की चिंगारी से लेकर उन्नीसवीं सदी के अंत तक अंग्रेजों ने महसूस कर लिया था कि भारत को केवल सेना के बल पर लंबे समय तक नियंत्रित रखना आसान नहीं होगा। हर विद्रोह के बाद नया नेता सामने आ रहा था और हर दमन के बाद प्रतिरोध पहले से अधिक मजबूत हो रहा था।
श्रृंखला के अगले भाग में हम जानेंगे उन क्रांतिकारियों की कहानी, जिन्होंने बीसवीं सदी में अंग्रेजी साम्राज्य को सबसे बड़ी चुनौती दी, मदन लाल धींगरा, खुदीराम बोस, श्री अरविंद, रासबिहारी बोस, बाघा जतिन और अन्य क्रांतिकारी, जिनकी गतिविधियों ने ब्रिटिश खुफिया तंत्र को लगातार सतर्क रहने पर मजबूर कर दिया।
