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मतदाता सूची में कटौती: चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर उठे सवाल

हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा की गई मतदाता सूची में कटौती ने कई राज्यों में विवाद खड़ा कर दिया है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, और दिल्ली जैसे राज्यों में करोड़ों नाम सूची से हटा दिए गए हैं, जिससे मतदाता और विपक्ष दोनों में चिंता बढ़ गई है। इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। जानें इस मुद्दे की गहराई और चुनाव आयोग की भूमिका के बारे में।
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मतदाता सूची में बड़े बदलाव


उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, और गुजरात सहित बारह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करोड़ों नामों में कमी आई है। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक कटौती हुई है, जबकि पश्चिम बंगाल में भी दस प्रतिशत से अधिक गिरावट देखी गई है। महाराष्ट्र में दो करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं, कर्नाटक में एक करोड़ से ज्यादा, और दिल्ली में लगभग 47.56 लाख नाम सूची से बाहर हो गए हैं।


मतदाता सूची चुनावी लोकतंत्र की नींव है। जब यह सही होती है, तो लोकतंत्र भी मजबूत होता है। लेकिन जब शुद्धिकरण का अर्थ लाखों मतदाताओं को सूची से बाहर करना बन जाए, तो चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगते हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया में यही विरोधाभास स्पष्ट हो रहा है।


आयोग का उद्देश्य सही है, कि कोई भी योग्य मतदाता छूट न जाए और कोई अपात्र शामिल न हो। सुप्रीम कोर्ट ने भी एसआईआर की वैधता को मान्यता दी है। लेकिन समस्या प्रक्रिया के कार्यान्वयन में है। घर-घर जाकर प्रगणन, 2002 की पुरानी सूची से मैपिंग, और 'तार्किक विसंगति' जैसे अस्पष्ट आधार ने आम मतदाता को संदेह में डाल दिया है।


बिहार में मतदाता सूची लगभग 7.89 करोड़ से घटकर 7.42 करोड़ रह गई है। अन्य राज्यों में भी इसी तरह की कटौती हुई है। विपक्ष का दावा है कि देशभर में लगभग 13 करोड़ नाम मसौदा स्तर पर हटा दिए गए हैं। ये आंकड़े अंतिम नहीं हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर कटौती से 'शुद्धिकरण' शब्द पर सवाल उठता है।


दिल्ली का हाल सबसे चिंताजनक है। 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए सूची 1.56 करोड़ थी, जो एसआईआर शुरू होने से पहले घटकर 1.45 करोड़ रह गई। इसके बाद केवल 67 प्रतिशत फॉर्म जमा हुए और सूची 97.53 लाख पर आ गई। एक तिहाई से अधिक नाम गायब हो गए हैं।


पश्चिम बंगाल में लाखों नाम 'संदिग्ध' श्रेणी में डाले गए हैं। अपील न्यायाधिकरणों में बहाली की दर बहुत ऊंची रही है। अगर सुनवाई के बाद इतने बड़े हिस्से को पात्र माना जा रहा है, तो पहले चरण में उन्हें अपात्र मानने की प्रक्रिया में गड़बड़ी स्पष्ट है।


चुनाव आयुक्तों ने इस प्रक्रिया पर कई बार आपत्ति दर्ज की है। आयोग का कहना है कि मतभेद सामान्य हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। लेकिन जब दो में से तीन आयुक्त बार-बार प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हों, तब 'सर्वसम्मति' का दावा पर्याप्त नहीं लगता।


प्रवासी मजदूरों, किरायेदारों और पहली बार वोट डालने वाले युवाओं के पास हमेशा वही दस्तावेज नहीं होते जो आयोग मांगता है। 'तार्किक विसंगति' की परिभाषा भी अस्पष्ट है। ऐसे में मतदाता खुद को इस जटिलता में फंसा हुआ पाता है।


मतदाता सूची का शुद्धिकरण आवश्यक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नागरिक को अपनी वैधता बार-बार साबित करनी पड़े। जानकारों का मानना है कि चुनाव आयोग को कुछ कदम उठाने चाहिए। पहले, एसआईआर से पहले और दौरान काटे गए हर नाम का कारण सार्वजनिक किया जाए। दूसरा, 'तार्किक विसंगति' के मापदंड स्पष्ट हों। तीसरा, समय बढ़ाया जाए और एसआईआर शिविर बस्तियों तक जाएं।