मोदी सरकार की चिंतन बैठक: क्या हैं असली मुद्दे?
मोदी सरकार का मध्यावधि चिंतन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार अब मध्यावधि में प्रवेश कर चुकी है। इस अवसर पर, उन्होंने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ दो दिवसीय चिंतन बैठक का आयोजन किया। इस बैठक में, मंत्रालयों के कार्यों की समीक्षा और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के उपायों पर चर्चा की गई। हालांकि, यह सवाल उठता है कि क्या यह बैठक केवल औपचारिकता थी या वास्तव में सरकार की चिंताओं को दूर करने का प्रयास?
सरकार की चुनौतियाँ
मोदी के तीसरे कार्यकाल में कोई भी निर्णय प्रभावी नहीं हो रहा है, जिससे नकारात्मक प्रचार बढ़ रहा है। लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बावजूद भाजपा ने कई राज्यों में चुनाव जीते हैं, लेकिन इसके बावजूद जनता में थकान और निराशा का माहौल है।
प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर दीये जलाने का अभियान भी अपेक्षित उत्साह नहीं पैदा कर सका। इसके अलावा, हाल ही में ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन भी भारत को विश्वगुरु बनाने में कोई खास योगदान नहीं दे सका।
संस्थाओं की साख पर संकट
चुनाव आयोग के कामकाज पर उठे सवालों ने सरकार की साख को और कमजोर किया है। रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ने मनमाने तरीके से निर्णय लिए हैं, जिससे विपक्ष को और अधिक सवाल उठाने का मौका मिला है।
सरकार ने डिजिटल लेनदेन पर शुल्क लगाने का निर्णय लिया, जिससे आम जनता में असंतोष बढ़ा है। इसके अलावा, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के मुद्दे ने भी सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ा है।
महंगाई और सामाजिक संकट
महंगाई की दर लगातार बढ़ रही है, जो वैश्विक संघर्षों के कारण और भी बढ़ गई है। खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि ने आम जनता को प्रभावित किया है।
छात्रों के आंदोलनों ने भी सरकार को परेशान किया है, जिसके कारण शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बावजूद, युवा वर्ग की असंतोष की भावना बनी हुई है।
भाजपा के समर्थकों का मोहभंग
भाजपा के समर्थकों में मोहभंग की स्थिति उत्पन्न हो रही है। एक वकील ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्होंने मोदी को अच्छे दिन के लिए चुना था, लेकिन स्थिति और भी खराब हो गई है।
सरकार को इस असंतोष का एहसास है, और इसलिए चिंतन बैठक में इन मुद्दों पर चर्चा की गई होगी।
