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म्यांमार में अस्थिरता: भारत-म्यांमार सीमा पर प्रभाव और चुनौतियाँ

म्यांमार में लोकतंत्र के संघर्ष और सैन्य तख्तापलट के बाद की स्थिति ने न केवल देश को बल्कि भारत-म्यांमार सीमा को भी प्रभावित किया है। मणिपुर में बढ़ती हिंसा और अस्थिरता ने सुरक्षा चिंताओं को जन्म दिया है। इस लेख में हम म्यांमार के इतिहास, मणिपुर संकट और भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी पर इसके प्रभावों का विश्लेषण करेंगे। क्या भारत अपनी सुरक्षा नीति को बनाए रख पाएगा? जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख।
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म्यांमार में अस्थिरता: भारत-म्यांमार सीमा पर प्रभाव और चुनौतियाँ

म्यांमार की कहानी: लोकतंत्र का संघर्ष

आज हम एक ऐसे देश की चर्चा करेंगे, जहां लोकतंत्र को हिंसा के माध्यम से समाप्त कर दिया गया है। म्यांमार, जहां नागरिकों के विरोध प्रदर्शनों को सेना ने टैंकों से कुचल दिया। यह केवल एक आंतरिक संघर्ष नहीं है, बल्कि इसमें वैश्विक शक्तियों का भी हस्तक्षेप है। अमेरिका, चीन, रूस, भारत और बांग्लादेश सभी के अपने-अपने हित हैं। आज हम म्यांमार के साथ-साथ दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को भी समझेंगे।


म्यांमार, जिसे पहले बर्मा के नाम से जाना जाता था, दक्षिण पूर्व एशिया में भारत की एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है। यह देश 100 से अधिक जातीय समूहों से भरा हुआ है। दशकों तक यहां सैन्य शासन रहा, लेकिन 2015 में लोगों ने लोकतंत्र का अनुभव किया। आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने चुनाव जीता, जिससे बदलाव की उम्मीद जगी। लेकिन 2021 में जब उनकी पार्टी ने फिर से जीत हासिल की, तो सेना ने चुनाव परिणामों को नकारते हुए तख्तापलट कर दिया, जिसमें चीन का समर्थन माना जाता है। आंग सू की को जेल में डाल दिया गया और देश में गृहयुद्ध छिड़ गया।


म्यांमार में वर्तमान स्थिति कोई नई नहीं है; इसका इतिहास बहुत पुराना है। यह सब तब शुरू हुआ जब म्यांमार ने 4 जनवरी 1948 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की। उस समय देश एकजुट नहीं था, बल्कि 100 से अधिक जातीय समूहों का संघ था। बर्मन या बामर समुदाय बहुमत में थे, लेकिन करेन, शान, कचिन और चिन जैसे समूह अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे। इन समूहों ने अपने क्षेत्र, भाषा, संस्कृति और शासन का अधिकार मांगा, लेकिन केंद्रीय सरकार ने सभी शक्तियां बर्मन नेतृत्व वाले सिस्टम को सौंप दीं, जिससे गृहयुद्ध की शुरुआत हुई।


1962 में, जब पहली बार सेना ने सत्ता पर कब्जा किया, जनरल नेविन ने कहा कि लोकतंत्र बर्बादी है और देश को बचाना होगा। इस प्रकार, सेना ने नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।


मणिपुर संकट और सीमा

हाल के वर्षों में मणिपुर में हुई हिंसा और अस्थिरता ने भारत-म्यांमार सीमा की संवेदनशीलता को फिर से उजागर किया है। मणिपुर की लगभग 400 किलोमीटर लंबी सीमा म्यांमार से जुड़ी हुई है, जहां 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इस कारण से शरणार्थियों, हथियारों और उग्रवादी गतिविधियों की आशंका बढ़ गई है।


भारत और म्यांमार के बीच लंबे समय तक फ्री मूवमेंट रिजीम (FMR) लागू था, जिसके तहत सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग बिना वीजा सीमित दूरी तक आ-जा सकते थे। लेकिन सुरक्षा चिंताओं के चलते भारत ने इस व्यवस्था की समीक्षा शुरू की और सीमा पर बाड़ लगाने की योजना बनाई। मणिपुर संकट ने यह सवाल उठाया है कि क्या सीमा पार की अस्थिरता भारत के आंतरिक सामाजिक और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।


फ्री मूवमेंट रिजीम क्या है

भारत और म्यांमार के बीच एक विशेष व्यवस्था थी, जिसके तहत सीमा के दोनों ओर रहने वाले पारंपरिक जनजातीय समुदाय बिना वीजा एक निश्चित दूरी तक एक-दूसरे के क्षेत्र में आ-जा सकते थे। यह सीमा ब्रिटिश काल में खींची गई थी, जिससे कई जनजातियां जैसे नागा, कुकी, चिन, मिजो आदि दो देशों में बंट गईं। इन रिश्तों को ध्यान में रखते हुए FMR लागू किया गया था।


2024 में भारत सरकार ने FMR को समाप्त करने या कड़ा करने और भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने की घोषणा की, ताकि अवैध घुसपैठ और सुरक्षा चुनौतियों पर नियंत्रण किया जा सके।


इसके तहत क्या सुविधा थी?

सीमा पार रहने वाले लोग बिना वीजा यात्रा कर सकते थे।


पहले लगभग 16 किमी तक आने-जाने की अनुमति थी।


सीमावर्ती समुदाय पारिवारिक, सामाजिक और व्यापारिक गतिविधियां कर सकते थे।


भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी पर असर

भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ना और ASEAN देशों के साथ व्यापार, कनेक्टिविटी तथा रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना है। लेकिन म्यांमार में जारी अस्थिरता और मणिपुर संकट ने इस नीति के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।


भारत की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं, जैसे India-Myanmar-Thailand Trilateral Highway और Kaladan Multi-Modal Transit Transport Project, म्यांमार से होकर गुजरती हैं। म्यांमार में गृहयुद्ध, सैन्य संघर्ष और सुरक्षा संकट के कारण इन परियोजनाओं की गति प्रभावित हुई है। दूसरी ओर, मणिपुर और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं ने सीमा पार व्यापार और लोगों की आवाजाही को भी प्रभावित किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत अपनी एक्ट ईस्ट पॉलिसी को उसी गति से आगे बढ़ा पाएगा, जैसी उसने कल्पना की थी?