लोकतंत्र में संवाद की आवश्यकता: सोनम वांगचुक का दृष्टिकोण
लोकतंत्र में संवाद का महत्व
लोकतंत्र में किसी नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए अपने शरीर को दाँव पर नहीं लगाना चाहिए। संसद, न्यायालय, जनप्रतिनिधि, आयोग, मीडिया और नागरिक संस्थाएँ इसलिए होती हैं कि कोई व्यक्ति अपने जीवन को अंतिम तर्क बनाने के लिए विवश न हो। यदि किसी नागरिक को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज़ इन सभी रास्तों से लौट आई है, तभी वह अपने शरीर को प्रतिरोध का माध्यम बनाता है। इस अर्थ में भूख हड़ताल लोकतंत्र की सामान्य भाषा नहीं, उसकी असफलता है।
सोनम वांगचुक को केवल एक आंदोलनकारी के रूप में देखना उनके महत्व को सीमित कर देता है। वे जिस प्रश्न को बार-बार उठाते हैं, वह किसी एक परीक्षा, नीति या केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है। उनका मूल प्रश्न विकास की उस अवधारणा से जुड़ा है, जिसने पिछले कुछ दशकों में भारत सहित पूरी दुनिया की राजनीति और प्रशासन को प्रभावित किया है—क्या विकास का उद्देश्य मनुष्य का जीवन बेहतर बनाना है, या व्यवस्था को अधिक सक्षम और प्रभावी बनाना?
कभी वे शिक्षा की बात करते हैं, कभी ग्लेशियरों की, कभी स्थानीय स्वशासन की और कभी लद्दाख के संवैधानिक अधिकारों की। आलोचक पूछते हैं कि इन सबका आपस में क्या संबंध है। लेकिन यदि उनके काम को ध्यान से देखें, तो एक साझा सूत्र स्पष्ट दिखाई देता है। शिक्षा हो, पर्यावरण हो, प्रशासन हो या लोकतंत्र—हर जगह उनका आग्रह यही है कि निर्णय उन लोगों के जीवन, भूगोल और अनुभव को केंद्र में रखकर लिए जाएँ, जिन पर उनका सीधा प्रभाव पड़ने वाला है।
यही सोच उनके तकनीकी प्रयोगों में भी दिखाई देती है। आइस स्तूप केवल जल संरक्षण की तकनीक नहीं है। वह प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहयोग का विचार है। सर्दियों के अतिरिक्त पानी को कृत्रिम हिम स्तूपों में संचित कर गर्मियों में खेती के लिए उपलब्ध कराना यह बताता है कि हर समस्या का समाधान प्रकृति पर विजय पाकर नहीं, उसके स्वभाव को समझकर भी खोजा जा सकता है। इसी प्रकार निष्क्रिय सौर ऊर्जा (Passive Solar) पर आधारित उनके निर्माण यह सिखाते हैं कि स्थानीय जलवायु को समझे बिना विकास केवल महँगी इंजीनियरिंग बनकर रह जाता है।
उनकी शिक्षा-दृष्टि भी इसी दर्शन से निकली है। बच्चे को उस जीवन से काटकर मत पढ़ाइए, जिसे वह प्रतिदिन जीता है। स्थानीय भाषा, स्थानीय समाज, स्थानीय प्रकृति और स्थानीय अनुभव शिक्षा की बाधाएँ नहीं, उसकी सबसे बड़ी पूँजी हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षाएँ पास कराना नहीं, मनुष्य को अपने परिवेश को समझने और बदलने योग्य बनाना है।
यहीं शिक्षा, पर्यावरण और लोकतंत्र एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की उनकी माँग भी इसी विचार का विस्तार है। किसी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को अपने भविष्य से जुड़े निर्णयों में वास्तविक भागीदारी मिलनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि हर नीति स्थानीय जनमत से ही तय हो। आधुनिक राष्ट्र केवल स्थानीय अनुभवों के आधार पर नहीं चल सकते। राष्ट्रीय सुरक्षा, टीकाकरण, वित्तीय व्यवस्था, आधारभूत ढाँचा और समान नागरिक अधिकारों के लिए एक सक्षम केंद्रीय राज्य आवश्यक है। प्रश्न केंद्रीकरण का नहीं, उसके संतुलन का है।
समस्या तब शुरू होती है, जब प्रशासनिक सुविधा संवेदनशीलता की जगह ले लेती है।
एक जैसी नीति हर जगह लागू करना शासन के लिए आसान हो सकता है, लेकिन समाज हमेशा एक जैसा नहीं होता। भारत का भूगोल, जलवायु, संस्कृति और अर्थव्यवस्था इतनी विविध है कि एक ही प्रशासनिक दृष्टि हर जगह समान परिणाम नहीं दे सकती। मैदानी इलाक़ों में बनने वाली सड़क और हिमालय में बनने वाली सड़क एक जैसी नहीं होती। राजस्थान का जल प्रबंधन और लद्दाख का जल प्रबंधन एक नहीं हो सकता। किसी महानगर में पर्यटन का अर्थ अलग है, जबकि सीमित जल स्रोतों और नाज़ुक पारिस्थितिकी वाले हिमालयी क्षेत्र में वही पर्यटन जीवन-प्रणाली को बदल सकता है।
इस अंतर को पहचानना विकास-विरोध नहीं है। यह केवल यह स्वीकार करना है कि विकास बुद्धिमानी से भी किया जा सकता है।
दरअसल, आधुनिक प्रशासन की सबसे बड़ी शक्ति उसका पैमाना (Scale) है। वह विशाल परियोजनाएँ बना सकता है, लाखों लोगों तक योजनाएँ पहुँचा सकता है, एक साथ पूरे देश में नीतियाँ लागू कर सकता है। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी सीमा भी बन जाती है। वह मनुष्य को प्रायः आँकड़ों, श्रेणियों और फाइलों में देखने लगता है। नागरिक धीरे-धीरे एक संख्या में बदल जाता है और समाज एक प्रशासनिक इकाई में।
यहीं से विकास का अर्थ भी बदलने लगता है।
सफलता इस बात से मापी जाती है कि कितनी सड़क बनी, कितने पुल बने, कितने करोड़ रुपये खर्च हुए, कितने घर बने, कितनी योजनाएँ पूरी हुईं। यह सब आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। उतना ही आवश्यक यह भी पूछना है कि क्या इन परियोजनाओं ने मनुष्य की वास्तविक क्षमता बढ़ाई? क्या उन्होंने समाज को अधिक आत्मनिर्भर बनाया? क्या उन्होंने स्थानीय जीवन, संस्कृति और प्रकृति को मजबूत किया, या केवल आँकड़ों में उपलब्धि जोड़ दी?
भारत के विकास-विमर्श में यही प्रश्न बार-बार पीछे छूट जाता है।
हम परियोजनाओं पर चर्चा अधिक करते हैं, उनके सामाजिक परिणामों पर कम। किसी बाँध, सड़क, औद्योगिक क्षेत्र या पर्यटन परियोजना की लागत और समय-सीमा पर विस्तृत बहस होती है, लेकिन उससे बदलने वाले स्थानीय जीवन, जल स्रोतों, संस्कृति और आजीविका पर अपेक्षाकृत कम। मानो विकास का उद्देश्य समाज नहीं, परियोजना को समय पर पूरा करना हो।
यह प्रवृत्ति केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। शिक्षा में भी यही दिखाई देती है। परीक्षा समय पर हो जाए, परिणाम घोषित हो जाएँ, प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो जाए—व्यवस्था इसे सफलता मान लेती है। लेकिन क्या उस पूरी प्रक्रिया ने अधिक सक्षम नागरिक तैयार किए? यह प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाता है। प्रशासन का स्वभाव है कि वह वही मापता है, जिसे तुरंत गिना जा सके; जबकि समाज की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ अक्सर वही होती हैं जिन्हें आँकड़ों में पूरी तरह नहीं बाँधा जा सकता।
यहीं सोनम वांगचुक का महत्व किसी एक आंदोलन से बड़ा हो जाता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि विकास केवल आर्थिक या प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, एक नैतिक प्रक्रिया भी है। वह यह तय करती है कि किसी राष्ट्र के केंद्र में परियोजनाएँ होंगी या मनुष्य; व्यवस्था होगी या नागरिक; सुविधा होगी या भविष्य।
यही प्रश्न आज भारत के सामने भी है।
हम एक शक्तिशाली राज्य बना रहे हैं—लेकिन क्या उतनी ही गंभीरता से एक सक्षम समाज भी बना रहे हैं? या फिर हमारी सारी ऊर्जा व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने में लग रही है, जबकि नागरिक धीरे-धीरे निर्णयों का सहभागी नहीं, केवल उनका प्राप्तकर्ता बनता जा रहा है?
जब संवाद की जगह प्रबंधन ले लेता है
यहीं से सोनम वांगचुक का प्रश्न केवल विकास का नहीं रह जाता। वह लोकतंत्र का प्रश्न बन जाता है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितनी योजनाएँ पूरी कीं या कितनी तेज़ी से निर्णय लिए। उसकी असली कसौटी यह है कि क्या उसने उन लोगों को भी सुना, जिनके जीवन पर उन निर्णयों का प्रभाव पड़ने वाला था। लोकतंत्र केवल शासन की प्रणाली नहीं है; वह शासन और समाज के बीच लगातार चलने वाला संवाद है। संवाद रुकते ही लोकतंत्र का स्थान धीरे-धीरे प्रशासन लेने लगता है।
यहीं आधुनिक राज्य की सबसे बड़ी विडंबना दिखाई देती है। उसके पास शक्ति है, संसाधन हैं, विशेषज्ञ हैं और निर्णय लागू करने की क्षमता है। नागरिक के पास इनमें से कुछ भी नहीं। उसके पास केवल अपना अनुभव है। वह बता सकता है कि किसी नीति का असर उसके जीवन पर क्या होगा, लेकिन उसे लागू करने की शक्ति उसके पास नहीं होती। इसलिए लोकतंत्र की नैतिकता इसी संतुलन में निहित है कि शक्ति अनुभव को सुने, केवल उस पर शासन न करे।
समस्या तब पैदा होती है, जब राज्य संवाद के बजाय प्रबंधन को प्राथमिकता देने लगता है।
आज किसी भी आंदोलन की पहली प्रशासनिक प्रतिक्रिया प्रायः यही होती है—बैरिकेड लगाइए, धारा 144 लगाइए, इंटरनेट बंद कीजिए, प्रदर्शन का दायरा सीमित कीजिए, नेतृत्व को हिरासत में लीजिए और फिर घोषणा कर दीजिए कि स्थिति नियंत्रण में है। प्रशासन की दृष्टि से यह दक्षता हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र की दृष्टि से यह समाधान नहीं है। व्यवस्था शांत दिखाई दे सकती है, समाज संतुष्ट हो—यह आवश्यक नहीं।
शांति और मौन में अंतर होता है।
मौन कई बार यह नहीं बताता कि असहमति समाप्त हो गई है। वह केवल यह बताता है कि उसके व्यक्त होने की जगह सिकुड़ गई है। इसलिए किसी लोकतंत्र की परिपक्वता विरोध की अनुपस्थिति से नहीं, विरोध को सुनने की क्षमता से आँकी जानी चाहिए।
इसी संदर्भ में भूख हड़ताल का प्रश्न सामने आता है।
लोकतंत्र में किसी नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए अपने शरीर को दाँव पर नहीं लगाना चाहिए। संसद, न्यायालय, जनप्रतिनिधि, आयोग, मीडिया और नागरिक संस्थाएँ इसलिए होती हैं कि कोई व्यक्ति अपने जीवन को अंतिम तर्क बनाने के लिए विवश न हो। यदि किसी नागरिक को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज़ इन सभी रास्तों से लौट आई है, तभी वह अपने शरीर को प्रतिरोध का माध्यम बनाता है।
इस अर्थ में भूख हड़ताल लोकतंत्र की सामान्य भाषा नहीं, उसकी असफलता है।
महात्मा गांधी के उपवासों की नैतिक शक्ति उनके जीवन से आती थी। वे दूसरों को दंड देने के लिए नहीं, स्वयं कष्ट सहकर समाज की अंतरात्मा को जगाने के लिए उपवास करते थे। स्वतंत्र भारत में भी पोट्टी श्रीरामुलु से लेकर अनेक आंदोलनों ने उपवास को नैतिक प्रतिरोध का माध्यम बनाया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर राजनीतिक विवाद का समाधान भूख हड़ताल से निकले। आधुनिक लोकतंत्र संस्थाओं से चलता है, असाधारण व्यक्तियों से नहीं।
फिर भी प्रश्न बना रहता है—यदि संस्थाएँ समय पर न सुनें, तो नागरिक क्या करे?
यही वह जगह है जहाँ राज्य की जिम्मेदारी सबसे अधिक बढ़ जाती है। सरकार को हर माँग माननी ही पड़े, यह आवश्यक नहीं। लेकिन हर गंभीर माँग का उत्तर देना आवश्यक है। केवल निर्णय पर्याप्त नहीं, उसका तर्क भी सार्वजनिक होना चाहिए। नागरिक यह जानने का अधिकारी है कि उसकी बात क्यों स्वीकार की गई, क्यों अस्वीकार की गई और किन आधारों पर।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता है, सर्वज्ञता नहीं।
दुर्भाग्य से आज बहस का स्तर भी बदल गया है। किसी नागरिक के तर्क का उत्तर देने के बजाय उसकी नीयत पर प्रश्न उठाना आसान हो गया है। किसी आंदोलन को तुरंत राजनीतिक साज़िश, विदेशी प्रभाव या विकास-विरोधी मानसिकता कह देना बहस को समाप्त कर देता है। इससे सत्ता तत्कालिक सुविधा तो पा सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक विश्वास खो देती है। स्वतंत्र नागरिक की जगह केवल दो श्रेणियाँ बचती हैं—समर्थक और विरोधी। नागरिकता का सबसे बड़ा नुकसान यहीं होता है।
विकास के प्रश्न पर भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि कोई हिमालय में अंधाधुंध निर्माण पर प्रश्न उठाए, तो उसे विकास-विरोधी कह देना आसान है। यदि कोई स्थानीय समाज के अधिकारों की बात करे, तो उसे राष्ट्रीय हित के विरुद्ध बताना भी आसान है। जबकि वास्तविक लोकतंत्र का दायित्व दोनों पक्षों को सुनना है। विकास और संरक्षण, राष्ट्रीय हित और स्थानीय अधिकार, केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण—इनके बीच संतुलन ही लोकतांत्रिक शासन की पहचान है।
सोनम वांगचुक का महत्व इसी संतुलन की याद दिलाने में है।
उनके हर विचार से सहमत होना आवश्यक नहीं। उनकी हर माँग स्वीकार करना भी आवश्यक नहीं। लेकिन उन्हें गंभीरता से सुनना आवश्यक है, क्योंकि उन्होंने अपनी विश्वसनीयता केवल भाषणों से नहीं, काम से अर्जित की है। उन्होंने समाधान बनाने की कोशिश की, तभी व्यवस्था पर प्रश्न उठाए। लोकतंत्र में नैतिक अधिकार का स्रोत यही होता है।
लेकिन इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष किसी एक व्यक्ति से भी बड़ा है।
भारत को और सोनम वांगचुकों की आवश्यकता नहीं है। किसी स्वस्थ गणतंत्र की सफलता इस बात में नहीं कि बार-बार असाधारण नागरिक जन्म लें और अपनी जान जोखिम में डालकर व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाएँ। उसकी सफलता इस बात में है कि सामान्य नागरिक भी बिना भय, बिना अनशन और बिना राष्ट्रीय संकट पैदा किए सुना जा सके।
यही किसी लोकतंत्र की परिपक्वता है।
आख़िरकार, कोई राष्ट्र केवल राजमार्गों, पुलों, हवाई अड्डों और आँकड़ों से आधुनिक नहीं बनता। वह तब आधुनिक बनता है, जब उसकी संस्थाएँ अपने नागरिकों पर भरोसा करती हैं और नागरिक अपनी संस्थाओं पर। विकास की सबसे बड़ी उपलब्धि ऊँची इमारतें नहीं, ऊँचा लोकतांत्रिक विश्वास है।
सोनम वांगचुक का आंदोलन बीत जाएगा। सरकारें बदलेंगी, नीतियाँ बदलेंगी, परीक्षाएँ फिर होंगी, नई परियोजनाएँ आएँगी। लेकिन एक प्रश्न बना रहेगा—क्या भारत ऐसा गणतंत्र बन रहा है जहाँ विकास का केंद्र मनुष्य है, या ऐसा प्रशासन जहाँ मनुष्य केवल एक आँकड़ा है?
इस प्रश्न का उत्तर केवल सरकार नहीं देगी। समाज भी देगा।
क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति राज्य नहीं, जागरूक नागरिक होते हैं। और किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि वह महान व्यक्तियों का सम्मान करे; बल्कि यह है कि उसे अपने साधारण नागरिकों की आवाज़ सुनने के लिए उनके असाधारण साहस की आवश्यकता ही न पड़े। (समाप्त)
