विपक्ष की रैली ने भाजपा में मचाई हलचल, राहुल गांधी बने मजबूत विकल्प
विपक्ष की एकजुटता का प्रदर्शन
रामलीला मैदान में आयोजित विपक्ष की रैली ने भाजपा सरकार में हलचल पैदा कर दी है। दस-राजाजी मार्ग पर जन-संसद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित किया गया। इंडिया समूह के सभी 22 राजनीतिक दलों ने एकजुटता का प्रदर्शन किया, हालांकि द्रमुक, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और यूनाइटेड जनता दल जैसे कुछ पुराने साथी इस दौरान अलग हो गए।
रविवार की रैली और शनिवार की जन-संसद के बाद राहुल गांधी को विपक्ष का एक मजबूत नेता माना जाने लगा है। पिछले बारह वर्षों से वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़े थे, लेकिन अब उनकी स्थिरता ने उन्हें एक ठोस विकल्प बना दिया है। भाजपा के भीतर इस स्थिति से बेचैनी साफ नजर आ रही है।
केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने रैली के दौरान इसे सिखों के जख्मों पर नमक छिड़कने का आरोप लगाया, जिससे भाजपा की बेचैनी और बढ़ गई। राहुल गांधी ने रैली में यह स्पष्ट किया कि वोट-चोरी के अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा। ऐसे बयान आमतौर पर राजनीतिक सभाओं में होते हैं, लेकिन राहुल का यह रुख भाजपा के लिए चिंता का विषय बन गया है।
विपक्ष की स्थिति भले ही कमजोर हो, लेकिन इंडिया समूह के पास लोकसभा में 184 और राज्यसभा में 63 सदस्य हैं, जो संसद का एक तिहाई से अधिक है। एनडीए के पास सांसदों का 58 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन भाजपा को यह याद रखना चाहिए कि उसका खुद का हिस्सा केवल 45 प्रतिशत है।
2014 में भाजपा को 17 करोड़ वोट मिले थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 23 करोड़ हो गई। लेकिन इसके बावजूद, भाजपा के खिलाफ वोट देने वालों की संख्या भी काफी अधिक रही है। ऐसे में, क्या नरेंद्र मोदी को 2029 के चुनावों में होने वाली संभावित चुनौतियों का अंदाजा नहीं है?
विपक्ष की रैली में आए लोगों की संख्या को कम दिखाने के लिए भाजपा ने प्रयास किए हैं, लेकिन असली मुद्दा अब वोट की सुरक्षा का है। रामलीला मैदान में आए लोगों की संख्या चाहे 75 हजार हो या एक लाख, यह महत्वपूर्ण है कि लोग एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए खड़े हुए हैं।
