विपक्षी दलों के सामने चुनाव आयोग के मुद्दे पर साझा आंदोलन की चुनौती
चुनाव आयोग के कार्यों पर उठे सवाल
विपक्षी दलों को लगातार ऐसे मुद्दे मिल रहे हैं, जिन पर वे एकजुट होकर सरकार के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। हाल ही में चुनाव आयोग के कार्यों पर एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर आयोग में मतभेद हैं। एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने खुलासा किया है कि पिछले 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। फॉर्म छह में किए गए बदलावों को भी दो आयुक्तों ने अवैध बताया है। इसके अलावा, ईआरओ को चुनाव आयोग के केंद्रीय डाटाबेस का उपयोग करने से रोकने का आरोप भी लगाया गया है। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और इससे विपक्षी दलों के पूर्व के आरोपों को बल मिला है।
विपक्षी दलों की एकजुटता की कमी
हालांकि, ऐसा प्रतीत नहीं होता कि विपक्षी दल इस मुद्दे पर एकजुट होकर आंदोलन करेंगे। चाहे जंतर मंतर पर प्रदर्शन हो या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला, सभी दल अपनी-अपनी राजनीति में व्यस्त हैं। राहुल गांधी छात्रों के साथ कार्यक्रम कर रहे हैं, जबकि अखिलेश यादव अपने राज्य के चुनाव में लगे हुए हैं। ममता बनर्जी अपने राज्य में फंसी हुई हैं और तेजस्वी यादव का ध्यान किसी और दिशा में है। झारखंड में हेमंत सोरेन की अपनी चिंताएं हैं, जबकि एमके स्टालिन गठबंधन से अलग हो गए हैं। शरद पवार की स्थिति भी स्पष्ट नहीं है।
संघर्ष का नेतृत्व कौन करेगा?
सूत्रों के अनुसार, कुछ कांग्रेस नेता चाहते हैं कि विपक्षी दलों के साथ बातचीत हो और मुख्य चुनाव आयुक्त के संबंध में आई रिपोर्ट के आधार पर एक राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन शुरू किया जाए। लेकिन सवाल यह है कि इस साझा आंदोलन का चेहरा कौन होगा? राहुल गांधी पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के मामलों में अभियान चला रहे हैं, और कांग्रेस चाहती है कि इस आंदोलन का नेतृत्व भी वही करें। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के नेता चाहते हैं कि केजरीवाल इस आंदोलन का नेतृत्व करें। दोनों दलों ने हाल के चुनावों को रद्द करने की मांग की है।
आंदोलन की संभावनाएं
यदि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इन मांगों पर एकजुट होते हैं और देशव्यापी आंदोलन शुरू करते हैं, तो इसका बड़ा प्रभाव हो सकता है। एसआईआर के बाद 13 करोड़ लोगों के नाम कट गए हैं, जो एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। लेकिन समस्या यह है कि जून में बैठक के बाद 'इंडिया' ब्लॉक की अगली बैठक नहीं हुई है। कौन बैठक की पहल करेगा, एजेंडा कौन तय करेगा, और नेतृत्व कौन करेगा, ये सभी सवाल अनुत्तरित हैं। इसलिए ऐसा लगता है कि सभी दल अपनी-अपनी लड़ाई लड़ेंगे और संसद सत्र का इंतजार करेंगे।
