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शिक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार और पेपर लीक की समस्या

भारत की शिक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार और पेपर लीक की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। हाल के आंदोलनों और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे ने इस मुद्दे को उजागर किया है। ब्रिटिश राज के समय की तुलना में आज की स्थिति में शिक्षकों की भूमिका कम होती जा रही है, और बाबू तथा ठेकेदारों का वर्चस्व बढ़ रहा है। जानें कैसे सरकारी नीतियों ने शिक्षा को प्रभावित किया है और क्या इसके पीछे के कारण हैं।
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शिक्षा में बाबू और ठेकेदारों का वर्चस्व


शिक्षा में आज शिक्षक की भूमिका नहीं, बल्कि बाबू, ठेकेदार और पार्टी के लोग महत्वपूर्ण बन गए हैं। अच्छे शासन की बजाय चुनाव जीतना प्राथमिकता बन गई है। इसी तरह, जीवन में भी सच्चाई की बजाय आडंबर को महत्व दिया जा रहा है। पढ़ाई-लिखाई, पत्रिकाओं और सेमिनारों में भी प्रोपेगंडा की अहमियत बढ़ गई है।


सार्वजनिक शिक्षा: गरीब की लुगाई-1


हाल ही में, कॉकरोच आंदोलन और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का कारण परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक और गड़बड़ी थी। पिछले दस वर्षों में पेपर लीक की सौ से अधिक घटनाएं हुई हैं, लेकिन इस पर कोई ठोस विचार नहीं हुआ। पहली बार, आंदोलन के बाद कुछ अधिकारियों के तबादले और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की खबरें आईं।


इतिहास पर नजर डालें तो, ब्रिटिश राज ने 1833 में सरकारी नौकरी के लिए योग्यता के आधार पर चयन की प्रक्रिया शुरू की थी। 1853 में, उच्च पदों के लिए लिखित परीक्षा का प्रावधान भी अंग्रेजों ने किया। उस समय पेपर लीक और भ्रष्टाचार की कोई घटना नहीं सुनी गई।


आज, विभिन्न उपायों और गोपनीयता के बावजूद, परीक्षाओं में उत्तर पुस्तिकाओं का सही मूल्यांकन नहीं हो रहा है। भ्रष्टाचार और पेपर लीक की घटनाएं आम हो गई हैं। केंद्रीय विद्यालयों और सीबीएसई की परीक्षाओं में भी फेल छात्रों को पास करने का चलन है।


हाल ही में, प्रतियोगी परीक्षाओं का केंद्रीकरण शुरू किया गया है, जिसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों के दाखिलों की परीक्षाएं भी शामिल हैं। यह भारतीय संविधान की संघीयता के खिलाफ है, जो राज्यों को शिक्षा में स्वतंत्रता देता है।


इस केंद्रीकरण से शिक्षकों और विद्वानों की उपेक्षा हुई है। यह एक अविश्वास का प्रतीक है, जिसमें सब कुछ बाबुओं और क्लर्कों पर छोड़ दिया गया है।


आज शिक्षा प्रणाली की स्थिति यह है कि शिक्षा के बजाय परीक्षा और डिग्री बांटना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। बच्चों की बौद्धिक और शारीरिक आवश्यकताओं की अनदेखी की जा रही है।


इस प्रकार, शिक्षा में आज बाबू, ठेकेदार और पार्टीबंदी महत्वपूर्ण हैं। सही शासन की बजाय चुनाव जीतना प्राथमिकता है।