शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर भूख हड़ताल, सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ी
जवाबदेही की मांग
हम केवल जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। यह नहीं कह रहे कि हमें या सोनम वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाया जाए। हमारी मांग है कि उस व्यक्ति को हटाया जाए जो परीक्षाएं सही तरीके से आयोजित नहीं कर सका है। लोकतंत्र में यह अपेक्षित है कि ऐसे व्यक्ति को अपने पद से हट जाना चाहिए। कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इसी मांग के लिए एकत्र हुए हैं।
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की तबीयत पिछले हफ्ते बिगड़ गई। अभिजित दीपके ने कहा कि कई राजनीतिक दलों के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता वहां समर्थन देने आए हैं, "लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के किसी सदस्य ने हमसे संपर्क नहीं किया है।"
दीपके ने कहा, "मुझे समझ नहीं आता कि सरकार नागरिकों के प्रति इतना उपेक्षापूर्ण क्यों है। हम केवल जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।"
भारत में लोकतंत्र और जवाबदेही
दीपके की टिप्पणी भारतीय लोकतंत्र पर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है। यदि भारत में सचमुच लोकतंत्र है, तो जवाबदेही की अपेक्षा उचित है। यह सच है कि परीक्षा आयोजन का तंत्र लगातार कमजोर होता जा रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी की पहल, जो पहले व्यंग्य के रूप में शुरू हुई थी, अब एक ठोस विरोध प्रदर्शन में बदल गई है।
इस बेचैनी का कारण यह है कि सब कुछ बिगड़ रहा है, लेकिन शासन के उच्च पदों पर बैठे लोग इसकी परवाह नहीं कर रहे हैं। जवाबदेही का अर्थ है कि अधिकारी को पीड़ितों के सवालों का जवाब देना चाहिए। यदि उनके पास संतोषजनक उत्तर नहीं है, तो उन्हें अपने पद से हट जाना चाहिए।
भूख हड़ताल का प्रभाव
दिल्ली की गर्मी और बारिश के बावजूद, जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल करने वाले लोग भाजपा की सत्ता को चुनौती नहीं दे रहे हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि सोनम वांगचुक ने पहले जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को हटाने के फैसले का समर्थन किया था।
क्या भाजपा और उसका मीडिया नेटवर्क वांगचुक को 'अर्बन नक्सल' या 'राष्ट्र विरोधी' कह सकते हैं? वांगचुक ने कहा है कि वे गांधीजी के अहिंसक प्रतिरोध के सिद्धांत में विश्वास करते हैं।
समर्थन में बदलाव
भाजपा सरकार ने वांगचुक की भूख हड़ताल पर ध्यान नहीं दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वह नागरिकों की न्यूनतम अपेक्षाओं को भी नजरअंदाज कर रही है। यह स्थिति 'मोदी से मोहभंग' की एक स्पष्ट परिघटना को जन्म दे रही है।
विश्लेषक आनंद रंगनाथन ने कहा कि मोदी की कार्यशैली में चुनावी जीत ही सबसे बड़ा मानक है। जब तक जनता उन्हें चुनावों में जीत दिला रही है, तब तक मंत्रियों को हटाने की आवश्यकता नहीं समझी जाती।
अंतरराष्ट्रीय छवि
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान नकारात्मक रिपोर्टिंग का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। हाल ही में नॉर्वे और ऑस्ट्रेलिया में उनकी यात्राओं के दौरान मीडिया ने उनकी प्रेस स्वतंत्रता और मीडिया के प्रति रुख पर सवाल उठाए।
इससे यह स्पष्ट होता है कि मोदी का नेतृत्व अब आम जनता के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है।
