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संविधान संशोधन बिल 2025: जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी की नई सिफारिशें

संविधान (130वां संशोधन) बिल, 2025 पर जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, जिसमें मंत्रियों के निलंबन की प्रक्रिया और तेज सुनवाई के प्रावधान शामिल हैं। समिति ने 30 दिनों की न्यायिक हिरासत को बनाए रखने के साथ-साथ फास्ट ट्रैक सुनवाई का भी सुझाव दिया है। विपक्ष ने इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है, जबकि सरकार इसे 'जेल से शासन' जैसी स्थिति को रोकने के लिए आवश्यक मानती है। जानें आगे की कार्रवाई क्या होगी।
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संविधान संशोधन बिल पर जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी की रिपोर्ट


नई दिल्ली: संविधान (130वां संशोधन) बिल, 2025 के संदर्भ में जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में महत्वपूर्ण संशोधनों का सुझाव दिया है। समिति ने गंभीर आपराधिक मामलों में मंत्रियों को सीधे हटाने के बजाय निलंबित करने की सिफारिश की है। इसके साथ ही, तेज सुनवाई, कानूनी सुरक्षा और निलंबन समाप्त करने से संबंधित प्रावधानों को जोड़ने का भी सुझाव दिया गया है। अब इस रिपोर्ट पर सरकार और संसद की आगामी कार्रवाई पर सभी की नजरें रहेंगी।


जेपीसी ने बिल में 'रिमूवल' या 'सीज टू बी अ मिनिस्टर' के स्थान पर 'सस्पेंशन' शब्द का उपयोग करने का सुझाव दिया है। समिति का मानना है कि निलंबन एक अस्थायी उपाय होगा, जिसे अदालत के निर्णय या कानूनी स्थिति में बदलाव पर समाप्त किया जा सकेगा। इससे न्यायिक प्रक्रिया के दौरान संतुलन बना रहेगा।


30 दिन का नियम और सुरक्षा उपाय

30 दिन का नियम रहेगा बरकरार


समिति ने मूल बिल में 30 दिनों की न्यायिक हिरासत के प्रावधान को बनाए रखने की सिफारिश की है। हालांकि, इसके साथ कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जोड़ने का सुझाव भी दिया गया है ताकि संभावित दुरुपयोग को रोका जा सके। समिति ने पांच साल या उससे अधिक सजा वाले अपराधों के लिए अलग सूची बनाने की भी बात की है।


फास्ट ट्रैक सुनवाई का प्रस्ताव

फास्ट ट्रैक सुनवाई का भी सुझाव


ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अन्य उच्च संवैधानिक पदों से जुड़े मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में होनी चाहिए। इसके अलावा, यदि संबंधित व्यक्ति बरी हो जाए या आरोपमुक्त हो जाए, तो उसका निलंबन स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए।


सरकार का उद्देश्य और विपक्ष की चिंताएं

सरकार का उद्देश्य और विपक्ष की आपत्ति


रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रस्ताव का उद्देश्य 'जेल से शासन' जैसी स्थिति को रोकना है। हालांकि, विपक्ष के कई दलों ने समिति की बैठक में भाग नहीं लिया और इस प्रस्ताव को राजनीतिक प्रतिशोध का साधन बनने की आशंका जताई। कई पक्षों ने यह भी सुझाव दिया कि केवल गिरफ्तारी को आधार न माना जाए।


आगे की कार्रवाई

अब आगे क्या होगा?


सूत्रों के अनुसार, जेपीसी की अंतिम रिपोर्ट 17 जुलाई तक तैयार हो सकती है। इसके बाद इसे मानसून सत्र में संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। भाजपा सांसद नरेश बंसल ने कहा कि सरकार संसदीय समितियों की सिफारिशों को गंभीरता से लेती है और जो सुझाव उचित होते हैं, उन्हें विधायी प्रक्रिया में शामिल किया जाता है।