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संसद के मानसून सत्र में सरकार की चुनौतियाँ और विपक्ष की स्थिति

इस लेख में संसद के आगामी मानसून सत्र के संदर्भ में सरकार की चुनौतियों और विपक्ष की स्थिति का गहन विश्लेषण किया गया है। जानें कि कैसे विपक्ष की संख्या में कमी आई है और सरकार को संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए किन रणनीतियों की आवश्यकता होगी। क्या सरकार 360 का आंकड़ा पूरा कर पाएगी? इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तृत जानकारी प्राप्त करें।
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संसद का मानसून सत्र और आंकड़ों का विश्लेषण

संसद का मानसून सत्र इस महीने के तीसरे सप्ताह में प्रारंभ होगा, और जैसे ही महीना शुरू हुआ, आंकड़ों का विश्लेषण भी शुरू हो गया है। सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार दो तिहाई बहुमत से कितनी दूर है और इसे कैसे प्राप्त करेगी। हालांकि, सवाल पूछने वाले सभी लोग इस बात से आश्वस्त हैं कि सरकार को इस बार कोई बड़ी समस्या नहीं आएगी। यह भी कहा जा रहा है कि अप्रैल के विशेष सत्र में भले ही अमित शाह को हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन इस बार उन्होंने पहले से ही तैयारी कर ली है। इसलिए, आंकड़ों के विश्लेषण में यह सवाल उठता है कि यदि 18 अप्रैल की तरह अधिकांश लोकसभा सांसद मतदान के लिए उपस्थित रहते हैं, तो सरकार 360 का आंकड़ा कैसे पूरा करेगी। इसके अलावा, यह भी जानना आवश्यक है कि सरकार को संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए कितने विपक्षी सांसदों को गैरहाजिर कराना होगा।


पहले यह देखना आवश्यक है कि 18 अप्रैल से अब तक विपक्ष ने कितना नुकसान उठाया है। अप्रैल में विपक्ष के पास 232 लोकसभा सांसद थे, जिनमें से 'इंडिया' ब्लॉक के 204 और ममता बनर्जी के 28 सांसद शामिल थे। दूसरी ओर, एनडीए के पास 293 सांसद थे। इसके अलावा, अन्य सांसद भी थे, जो किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं थे, जैसे वाईएसआर कांग्रेस, एमआईएम, पंजाब के दो और जम्मू-कश्मीर के एक निर्दलीय सांसद। विपक्ष के 232 सांसदों में से 26 कम हो गए हैं। तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 सांसद अलग हो गए और त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने सरकार का समर्थन करने का ऐलान किया है। इसी तरह, उद्धव ठाकरे की पार्टी के छह सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए हैं। इस प्रकार, विपक्ष की संख्या 206 रह गई है। दूसरी ओर, सरकार को मिजोरम की सत्तारूढ़ पार्टी जेडपीएम के एक लोकसभा सांसद का समर्थन भी मिल गया है, जिससे एनडीए की संख्या 320 हो गई है।


विपक्ष की पार्टियों में हुई टूट के अलावा, तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस के बीच अलगाव भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। हालांकि, डीएमके ने एसआईआर के मुद्दे पर चीफ जस्टिस को लिखी गई चिट्ठी में विपक्ष की पार्टियों के साथ दस्तखत किए हैं, लेकिन उसके नेता 'इंडिया' ब्लॉक की बैठक में शामिल नहीं हुए। अब यह कहा जा रहा है कि सरकार की नजर डीएमके, समाजवादी पार्टी के कुछ सांसदों और शरद पवार की एनसीपी पर है। यदि स्थिति यथावत रहती है, यानी सरकार के पास 320 और विपक्ष के पास 206 सांसद हैं, तो भी सरकार संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाएगी। इसके लिए सरकार को या तो विपक्ष के कुछ और सांसदों को तोड़ना होगा या विपक्ष की पार्टियों के सांसदों को मतदान के समय गैरहाजिर कराना होगा। गैरहाजिर कराने के लिए सरकार की नजर सपा, डीएमके और शरद पवार की एनसीपी पर है। साथ ही, ममता बनर्जी के पास बचे हुए आठ सांसदों पर भी ध्यान है। ध्यान रहे कि अप्रैल में वोटिंग के समय सरकार को 298 वोट मिले थे, यानी अपनी संख्या से पांच अधिक। यदि स्थिति यथावत रहती है, तो सरकार को लगभग 60 सांसदों को गैरहाजिर कराना होगा। यह भी कहा जा रहा है कि आवश्यकता पड़ने पर कांग्रेस के 99 सांसदों में से भी कुछ लोग गैरहाजिर हो सकते हैं।