संसद में पेपर लीक बिल पर गरमागरम बहस, खड़गे का विवादास्पद बयान
संसद में पेपर लीक रोकने के लिए बिल पर चर्चा
नई दिल्ली। लोकसभा में 'पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रीवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल, 2026' पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने अन्य मुद्दों को उठाकर विवाद खड़ा किया। इसी तरह, राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक अलग विवाद को जन्म दिया जब उन्होंने मनुस्मृति और शूद्रों के पढ़ने के अधिकार पर सवाल उठाया। उनके इस बयान ने उच्च सदन में काफी देर तक बहस को जन्म दिया।
खड़गे ने पेपर लीक के खिलाफ इस बिल पर बोलते हुए आरोप लगाया कि शैक्षणिक संस्थानों पर आरएसएस का नियंत्रण बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति के अनुयायियों की संख्या में वृद्धि हो रही है, जिससे शूद्रों का पढ़ाई का अधिकार प्रभावित हो रहा है। इस पर सदन में हंगामा मच गया। जेपी नड्डा ने खड़गे के बयान को तथ्यहीन बताते हुए कहा कि इससे अशांति फैल सकती है। इसके बाद सभापति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि खड़गे का बयान रिकॉर्ड से हटा दिया जाएगा।
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने खड़गे के बयान का जवाब देते हुए बताया कि मनुस्मृति का पहला अंग्रेजी अनुवाद 1790 में हुआ था और उसमें शूद्रों की अवधारणा आज की सोच से भिन्न है। खड़गे का यह विवाद संसद के बाहर और सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
इससे पहले, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने पेपर लीक के खिलाफ लाए गए बिल को पेश किया, जिसे लोकसभा से पास किया जा चुका है। लोकसभा में इस पर मंगलवार को नौ घंटे और बुधवार को सात घंटे तक बहस हुई। गुरुवार को राज्यसभा में चर्चा के दौरान खड़गे ने कहा कि सरकार को छात्रों के आंदोलन और जनदबाव के आगे झुकना पड़ा। उन्होंने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान को हटाना और संशोधन बिल लाना छात्रों के हित में नहीं, बल्कि सरकार की कुर्सी बचाने की मजबूरी थी। खड़गे ने यह भी कहा कि केवल सजा बढ़ाने या स्पेशल टास्क फोर्स बनाने से पेपर लीक नहीं रुकेंगे।
