समाजवादी नेताओं की विदाई: क्या समाजवाद का भविष्य खतरे में है?
समाजवादी नेताओं का राजनीतिक सफर
समाजवादी नेताओं की एक के बाद एक विदाई भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रही है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी देवगौड़ा, जो जेडीएस के संस्थापक हैं, अब संसद में नहीं रहेंगे। उनकी पार्टी भाजपा पर निर्भर है, लेकिन उन्हें राज्यसभा में भेजने का कोई प्रयास नहीं किया गया। इससे पहले, सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया था, और डीके शिवकुमार को उनकी जगह नियुक्त किया गया।
सिद्धारमैया की उम्र लगभग 80 वर्ष है, और मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना कठिन होगा। इसी तरह, नीतीश कुमार की विदाई भी बिहार में हुई, जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकले थे। हालाँकि वे अभी राज्यसभा में हैं, लेकिन उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति उन्हें सक्रिय राजनीति में बनाए रखने में असमर्थ है।
यह विचार करने की आवश्यकता है कि समाजवादी नेताओं की विदाई का देश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। जब राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेता गए थे, तब भी यही सवाल उठता था कि समाजवाद का क्या होगा। हालांकि, उनके शिष्यों ने राजनीतिक सफलता प्राप्त की, लेकिन अब यह परंपरा आगे नहीं बढ़ पाएगी।
समाजवादी नेताओं ने अपने वैचारिक उत्तराधिकारी नहीं बनाए हैं। उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को ही अपनी राजनीतिक विरासत सौंप दी है। इससे यह संभावना कम हो गई है कि वे समाजवाद को आगे बढ़ा सकें।
वर्तमान में, यह समय पूंजीवादी उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार करने का है। समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टियों का ह्रास हो रहा है, और द्रविड राजनीति भी हाशिए पर जा रही है।
अब सवाल यह है कि क्या समाजवादी मुद्दे भी समाप्त हो गए हैं? दिलचस्प बात यह है कि समाजवाद और साम्यवाद कमजोर हुए हैं, लेकिन उनके मुद्दे अब भी प्रभावी हैं। 'जेन जी समाजवाद' का विचार उभर रहा है, जिसमें युवा वर्ग सम्मानजनक नौकरी, सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग कर रहा है।
यदि यह पीढ़ी अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करती है, तो समाजवाद का एजेंडा जीवित रहेगा, चाहे समाजवादी नेता या पार्टियां बचें या नहीं।
