सुप्रीम कोर्ट की डिजिटल अरेस्ट पर सख्त टिप्पणी, RBI से मांगी सूची
सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर चिंता व्यक्त करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से उन सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची मांगी है, जिन पर नए नियम लागू होंगे। कोर्ट ने कहा कि यदि बैंक की जांच में लापरवाही के कारण धोखाधड़ी होती है, तो पीड़ित को हुए नुकसान की भरपाई की व्यवस्था होनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस जेवी मोहन की पीठ ने डिजिटल अरेस्ट से संबंधित मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई की। कोर्ट ने यह भी कहा कि RBI के प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देशों की समीक्षा 2026 में की जाएगी। सुनवाई में बताया गया कि इन निर्देशों को 30 नवंबर तक अधिसूचित करने और दिसंबर से लागू करने की योजना है।
डिजिटल अरेस्ट के शिकार क्यों हो रहे हैं लोग?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह सवाल उठाया कि मीडिया में जागरूकता अभियान चलने के बावजूद लोग डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का शिकार क्यों हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब लोगों को मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी की धमकी मिलती है, तो उन्हें घबराने के बजाय इसकी सच्चाई की जांच करनी चाहिए। अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी ने बताया कि हाल ही में एक महिला 2.5 करोड़ रुपये की ठगी का शिकार हुई। उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी का डर लोगों को ठगों की मांग मानने के लिए मजबूर कर देता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि किसी फोन कॉल पर गिरफ्तारी का दावा किए जाने से उसे सच नहीं मान लेना चाहिए। अदालती आदेशों की पुष्टि न्यायपालिका की आधिकारिक वेबसाइटों से की जा सकती है।
संदिग्ध लेनदेन रोकने के लिए बैंक बनाएं व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के बाद रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं है। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे संदिग्ध लेनदेन की पहचान पहले से की जा सके। कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि किसी ग्राहक के खाते में असामान्य लेनदेन दिखाई दे, तो बैंक उसे कुछ समय के लिए रोकने पर विचार कर सकते हैं। इसके बाद संबंधित पुलिस थाने को स्वचालित सूचना भेजी जाए और लेनदेन की वास्तविकता की जांच की जाए।
लापरवाही पर बैंक की जवाबदेही तय करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि डिजिटल ठगी में बैंक की लापरवाही सामने आती है, तो उसे पीड़ित को मुआवजा देने के साथ जवाबदेही भी निभानी पड़ सकती है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रस्तावित नियमों में पीड़ित को हुए नुकसान की भरपाई का प्रावधान होना चाहिए। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने सवाल किया कि नियमों का उल्लंघन करने पर केवल नोटिस जारी करना कितना प्रभावी होगा। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि केवल दिशा-निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। नियम ऐसे होने चाहिए, जिनका पालन अनिवार्य हो और उल्लंघन करने पर ठोस कार्रवाई की जा सके।
केंद्र सरकार और RBI से समन्वित कार्रवाई की मांग
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि डिजिटल धोखाधड़ी पर रोक लगाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। उनके अनुसार, बैंक पहले की तुलना में संदिग्ध लेनदेन की बेहतर पहचान कर रहे हैं। RBI के साथ नियम बनाने को लेकर चर्चा भी हुई है। उन्होंने बताया कि भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा दूरसंचार विभाग (DoT) भी इस समस्या से निपटने के लिए काम कर रहे हैं।
WhatsApp ने 9,400 संदिग्ध अकाउंट बंद किए
सुनवाई में मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और दूरसंचार सेवाओं की भूमिका पर भी चर्चा हुई। WhatsApp ने अदालत को बताया कि उसने 9,400 संदिग्ध अकाउंट बंद किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने प्लेटफॉर्म को मामले की सुनवाई में पक्षकार के रूप में शामिल होने की अनुमति दी। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि कुछ खातों में संदिग्ध गतिविधियों की पहचान कर ग्राहकों को चेतावनी देने वाले सॉफ्टवेयर पर काम हो रहा है। जस्टिस बागची ने फोन में वैकल्पिक सुरक्षा फीचर देने का सुझाव दिया, जिससे ग्राहक जरूरत पड़ने पर संदिग्ध कॉल को रोक सकें।
800 करोड़ रुपये के नुकसान का हवाला, राज्यों से रिपोर्ट मांगी
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई में कहा कि इस साल डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों के कारण अर्थव्यवस्था को लगभग 800 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों को डिजिटल अरेस्ट मामलों में दर्ज FIR, जांच की स्थिति और ऐसे अपराधों को रोकने तथा आरोपियों पर कार्रवाई करने के सुझावों का विवरण देने का निर्देश दिया। अदालत ने RBI से अगली सुनवाई में उन सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची पेश करने को कहा है, जिन पर प्रस्तावित नियामकीय ढांचा लागू होगा।
