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सुप्रीम कोर्ट में पंजाब सरकार की CBI जांच के खिलाफ याचिका पर सुनवाई स्थगित

पंजाब सरकार ने CBI जांच के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, लेकिन सुनवाई स्थगित कर दी गई है। हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच CBI को सौंपने का आदेश दिया था। जानें इस मामले में क्या हुआ और पंजाब सरकार ने किन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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पंजाब सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों की CBI जांच


पंजाब सरकार की स्थिति: पंजाब सरकार के कुछ सदस्यों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच CBI द्वारा की जा रही है। हाल ही में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस जांच का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। हालांकि, गुरुवार को इस मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले को शुक्रवार तक के लिए टाल दिया। कोर्ट ने बताया कि संबंधित फाइल समय पर नहीं पहुंच पाई थी। हाईकोर्ट ने CBI को दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था।


सुनवाई में देरी का कारण

गुरुवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि फाइल उनके साथी जस्टिस शील नागू के पास नहीं पहुंची थी, जिसके कारण सुनवाई को शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया। पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मामले में पेशी दी। राज्य सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी। यह याचिका अधिवक्ता निखिल सराफ द्वारा दायर मूल मामले में हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देती है।


हाईकोर्ट का CBI जांच का आदेश

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने CBI को भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने का निर्देश दिया था। अदालत ने पंजाब पुलिस और राज्य सरकार को सभी संबंधित दस्तावेज CBI को उपलब्ध कराने का आदेश दिया। आरोप लगाया गया था कि सरकारी व्यवस्था में तबादलों के लिए पैसे लिए गए और कुछ नीतियों को लाभकारी बनाने के लिए भी धन की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा पंजाब सरकार को पत्र भेजे जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई।


सुप्रीम कोर्ट में पंजाब सरकार की अपील

पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के आदेश को कई आधारों पर चुनौती दी है। राज्य सरकार का मुख्य तर्क है कि हाईकोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 66(2) के तहत साझा की गई जानकारी की कानूनी प्रकृति को सही तरीके से नहीं समझा। राज्य सरकार का कहना है कि इस जानकारी को ऐसा निर्देश नहीं माना जा सकता जिसके आधार पर FIR दर्ज करना या आपराधिक जांच शुरू करना अनिवार्य हो। पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2022 के विजय मदनलाल चौधरी मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया है।