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हरियाणा में डॉक्टरों की कमी: स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर संकट

हरियाणा में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी से स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, हजारों पद रिक्त हैं, जिससे मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। नए मेडिकल कॉलेजों में स्थिति और भी खराब है, जहां अधिकांश पद खाली हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी भी गंभीर है, जिससे सामान्य और गंभीर बीमारियों का इलाज प्रभावित हो रहा है। सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का दबाव बढ़ता जा रहा है, जबकि डॉक्टरों के इस्तीफे की वजह से स्थिति और भी बिगड़ रही है।
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हरियाणा में डॉक्टरों की स्थिति

हरियाणा डॉक्टरों की भर्ती: हरियाणा के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों और तकनीकी स्टाफ की भारी कमी हो गई है। जून 2026 में विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य के आठ सरकारी मेडिकल कॉलेजों में स्वीकृत 3,843 डॉक्टरों में से 2,572 पद खाली हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण मरीजों को सामान्य जिला अस्पतालों से लेकर बड़े रेफरल अस्पतालों में घंटों तक इंतजार करना पड़ता है।


पैरामेडिकल स्टाफ की स्थिति

पैरामेडिकल स्टाफ की स्थिति भी डॉक्टरों से कम नहीं है। कुल स्वीकृत 5,280 पदों में से 2,742 पद खाली हैं, जबकि केवल 2,538 कर्मी कार्यरत हैं। लैब तकनीशियन, ओटी सहायक और फार्मासिस्ट की कमी के कारण जांच और उपचार में देरी हो रही है।


नए मेडिकल कॉलेजों की स्थिति

नए मेडिकल कॉलेजों का हाल


नए स्थापित मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों की कमी सबसे अधिक है। जींद के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 559 स्वीकृत पदों में से 555 रिक्त हैं, जो कि 99.3 प्रतिशत है।


महेंद्रगढ़ मेडिकल कॉलेज में 559 में से 492 (88 प्रतिशत) और भिवानी में 552 में से 477 (86.4 प्रतिशत) पद खाली हैं। नूंह मेडिकल कॉलेज में 362 में से 197 (54.4 प्रतिशत) और करनाल में 54.5 प्रतिशत पद रिक्त हैं। प्रदेश के सबसे बड़े संस्थान पीजीआईएमएस रोहतक में भी 852 में से 341 पद खाली हैं।


विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी

विशेषज्ञों की भारी कमी


सामान्य बीमारियों के अलावा गंभीर रोगों के इलाज के लिए भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। राज्य में रेडियोलॉजी के 34 मानक पदों में से केवल 25 डॉक्टर उपलब्ध हैं।


महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए स्त्री रोग विशेषज्ञ (गाइनेकोलॉजी) के 321 स्वीकृत पदों में से सिर्फ 109 डॉक्टर तैनात हैं। जनरल सर्जरी में 289 पदों के मुकाबले केवल 83 और बाल रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिक्स) के 290 पदों में से 73 डॉक्टर ही सेवाएं दे रहे हैं।


सरकारी अस्पतालों पर बढ़ता दबाव

सरकारी अस्पतालों पर बोझ


डॉक्टरों की कमी के बावजूद सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली पर मरीजों का भरोसा और दबाव लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2025 में राज्य के जिला अस्पतालों में 95.71 लाख ओपीडी परामर्श दर्ज किए गए। गुरुग्राम के सेक्टर 10 सिविल अस्पताल में प्रतिदिन 2,000 मरीजों का ओपीडी लोड देखा जा रहा है।


पीपीपी मॉडल पर संचालित चार जिला अस्पतालों की कैथ लैब में वर्ष 2024-25 के दौरान 83,798 दिल के मरीजों ने ओपीडी परामर्श लिया। इसी अवधि में जिला अस्पतालों में 1.5 लाख से अधिक सीटी स्कैन भी किए गए।


डॉक्टरों के इस्तीफे के कारण

डॉक्टरों के इस्तीफे की वजह


सरकारी तंत्र से डॉक्टरों का मोहभंग कोई नई बात नहीं है। 2023 में जारी आंकड़ों के अनुसार, 2022 में 92 और मई 2023 तक 22 मेडिकल अफसरों ने नौकरी से इस्तीफा दिया। इसी दौरान 13 डॉक्टरों ने वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) ली थी।


डॉक्टरों के लगातार सेवा छोड़ने के कारणों की जांच के लिए सरकार ने एक समिति का गठन किया था। डॉक्टरों ने निजी क्षेत्र की तुलना में कम वेतन और सरकारी ड्यूटी के अत्यधिक कार्यभार को इस्तीफे का मुख्य कारण बताया था।