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बीकानेर का करणी माता मंदिर: चूहों की अनोखी आस्था

बीकानेर का करणी माता मंदिर, जिसे चूहों के मंदिर के नाम से जाना जाता है, अपनी अनोखी परंपराओं और रहस्यमय कहानियों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ देवी करणी माता की पूजा की जाती है, और मंदिर में हजारों चूहे निवास करते हैं, जिन्हें श्रद्धालु प्रेम से अर्पित करते हैं। सफेद चूहों को विशेष महत्व दिया जाता है, और इनकी उपस्थिति को शुभ माना जाता है। करणी माता का इतिहास भी दिलचस्प है, जिसमें उनके पुत्र की पुनर्जीवित करने की प्रार्थना शामिल है। इस मंदिर की भव्यता और आस्था इसे एक अद्वितीय धार्मिक स्थल बनाती है।
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बीकानेर में करणी माता मंदिर


बीकानेर: भारत की सांस्कृतिक धरोहर में प्राचीन मंदिरों का विशेष स्थान है। देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे मंदिर हैं, जहां श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। इनमें से कुछ मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं और रहस्यमय कहानियों के लिए प्रसिद्ध हैं। आज हम राजस्थान के बीकानेर में स्थित करणी माता मंदिर के बारे में चर्चा करेंगे, जिसे चूहों के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।


करणी माता मंदिर की विशेषताएँ

यह मंदिर देवी करणी माता को समर्पित है, जिन्हें देवी दुर्गा का अवतार माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में माता की प्रतिमा स्थापित है, और उनके दोनों ओर उनकी बहनों की मूर्तियाँ भी हैं। इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ हजारों चूहे निवास करते हैं। कहा जाता है कि यहाँ लगभग 25,000 चूहे हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'काबा' कहा जाता है। ये चूहे मंदिर परिसर में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं, और श्रद्धालु इन्हें दूध, मिठाई और प्रसाद बड़े प्रेम से अर्पित करते हैं।


सफेद चूहों का महत्व

मंदिर में सफेद चूहों को सबसे पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि ये करणी माता और उनके परिवार के अवतार हैं। यदि किसी भक्त को सफेद चूहा दिखाई दे, तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। यहाँ गलती से भी किसी चूहे को मारना एक बड़ा पाप माना जाता है। यदि ऐसा हो जाए, तो प्रायश्चित के लिए सोने का चूहा चढ़ाना पड़ता है।


करणी माता का इतिहास

करणी माता 14वीं शताब्दी की एक संत थीं, जो चारण जाति से थीं और तपस्वी जीवन व्यतीत करती थीं। स्थानीय लोग उन्हें देवी दुर्गा का रूप मानते हैं। उन्होंने बीकानेर और जोधपुर के किलों की नींव रखवाई थी। आज भी लोग उन्हें 'मां' कहकर पूजते हैं। कहा जाता है कि करणी माता के सौतेले पुत्र लक्ष्मण की डूबने से मृत्यु हो गई थी। माता ने यमराज से प्रार्थना की कि उनके बेटे को पुनर्जीवित किया जाए। पहले यमराज ने मना कर दिया, लेकिन बाद में माता के आग्रह पर उन्होंने लक्ष्मण और उनके सभी वंशजों को चूहों के रूप में जन्म देने का वरदान दिया। यही कारण है कि इस मंदिर में चूहों का इतना सम्मान है।


मंदिर की संरचना और मेला

मंदिर का निर्माण बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने 20वीं सदी की शुरुआत में करवाया था। पूरी इमारत संगमरमर से बनी है और इसमें मुगल शैली की झलक देखने को मिलती है। प्रवेश द्वार पर चांदी के दरवाजे लगे हैं, जिन पर देवी की कथाएँ उकेरी गई हैं। यहाँ प्रतिदिन सुबह मंगल आरती और भोग अर्पित किया जाता है। साल में दो बार चैत्र और आश्विन नवरात्र के दौरान करणी माता मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। करणी माता मंदिर अपनी अनोखी परंपरा और आस्था के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध है। यहाँ आने वाले भक्त चूहों को भी उतनी ही श्रद्धा से देखते हैं जितनी माता को।