गोमती नदी का संकट: प्रदूषण और अतिक्रमण से जूझती जीवनरेखा
गोमती नदी का अस्तित्व संकट में
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की लखनऊ में बहने वाली गोमती नदी आज गंभीर संकट का सामना कर रही है। यह नदी, जो कभी स्वच्छ जल, जैव विविधता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक थी, अब सिकुड़ती धारा, प्रदूषण और अवैध अतिक्रमण के कारण संकट में है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, नदी का जलस्तर घट रहा है और प्रदूषण के कारण पानी जहरीला होता जा रहा है।
राजनीतिक आरोप और पर्यावरणीय चिंताएँ
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और पर्यावरण विशेषज्ञों का आरोप है कि भाजपा सरकार ने नदी संरक्षण के नाम पर केवल दावे किए हैं, जबकि वास्तविकता में स्थिति लगातार बिगड़ती गई है। सीवेज, अवैध खनन और किनारों पर अतिक्रमण ने गोमती की धारा को कमजोर कर दिया है।
अखिलेश यादव ने एक वीडियो साझा करते हुए कहा कि भाजपा की नीतियों के कारण गोमती नदी का अस्तित्व संकट में है, जिससे राजधानी की लगभग 20 लाख जनता और नदी में रहने वाले जीवों पर खतरा मंडरा रहा है।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि गोमती नदी के जलस्रोतों और सहायक नालों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया है। कई स्थानों पर जलस्तर चिंताजनक रूप से घटा है, जिससे जलीय जीवों और पारिस्थितिकी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
विपक्ष का कहना है कि नदी पुनर्जीवन के लिए आवंटित धन का अपेक्षित परिणाम नहीं दिख रहा है। भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी ने गोमती को संकट में डाल दिया है।
सरकार के प्रयास
सरकार का कहना है कि गोमती के संरक्षण के लिए कई परियोजनाएँ चल रही हैं। गोमती का मुद्दा केवल एक नदी का नहीं, बल्कि पर्यावरण और जल सुरक्षा का भी है। इसे वैज्ञानिक और पारदर्शी प्रयासों के माध्यम से बचाने की आवश्यकता है।
हालांकि, गोमती नदी की सफाई और पुनर्जीवन परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद, नदी गंभीर पारिस्थितिक संकट में है। प्रदूषण का स्तर चिंताजनक बना हुआ है, और जलीय जैव विविधता घट रही है।
गोमती नदी का पारिस्थितिकी तंत्र
गोमती नदी लाखों लोगों को पीने का पानी मुहैया कराती है और एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करती है। जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण के बढ़ते दबाव के साथ, गोमती जैसी नदियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
बीबीएयू के प्रोफेसर वेंकटेश दत्ता ने कहा कि गोमती को बचाने के लिए पहले कदम के रूप में नगरपालिका के सीवेज का 100% उपचार सुनिश्चित करना आवश्यक है।
भविष्य की चुनौतियाँ
पिछले दो दशकों में, सरकारों ने नदी से संबंधित परियोजनाओं में भारी निवेश किया है, लेकिन गोमती को अपेक्षित पुनर्जीवन नहीं मिल सका। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पारिस्थितिकी संकेतक एक अधिक जटिल कहानी बयां करते हैं।
प्रदूषण का प्रभाव नदी की पारिस्थितिकी में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। जलीय जीवन की कमी और देशी मछलियों की आबादी में गिरावट चिंता का विषय है।
गोमती और सहायक नदियों का संरक्षण
लखनऊ में गोमती की सहायक नदियों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है ताकि मुख्य नदी में प्रदूषण को कम किया जा सके। कई परियोजनाएँ शुरू की गई हैं, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि सुधार सीमित है।
जब तक सहायक नदियों का प्रभावी ढंग से जीर्णोद्धार नहीं किया जाता, गोमती नदी को पुनर्जीवित करने के प्रयास सफल नहीं हो सकते।
