डॉ. वी. राजशेखर वुडरू का विदाई समारोह: जनसेवा और सम्मान का अनूठा उदाहरण
डॉ. वुडरू का विदाई समारोह
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) - हरियाणा के सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. वी. राजशेखर वुडरू की विदाई समारोह केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह उनके जनसेवा, संवेदनशील प्रशासन और सामाजिक सरोकारों के प्रति अभूतपूर्व सम्मान का प्रतीक बन गया। यह कार्यक्रम चंडीगढ़ के रानी लक्ष्मीबाई ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से उनके शुभचिंतक शामिल हुए। इस अवसर पर राज्यसभा सांसद कर्मवीर बौद्ध, कई प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे।
तीन दशकों से अधिक समय तक प्रशासनिक सेवा में अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. वुडरू को सम्मानित करने के लिए बड़ी संख्या में लोग ऑडिटोरियम में एकत्रित हुए। कई लोगों ने पास के सामुदायिक केंद्र में एलईडी स्क्रीन के माध्यम से कार्यक्रम का आनंद लिया।
भावुक डॉ. वुडरू का संबोधन
भावुक हुए डॉ. वुडरू, बोले— यह सम्मान जीवन की सबसे बड़ी पूंजी
अपने संबोधन में डॉ. राजशेखर वुडरू ने भावुकता के साथ कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक सरकारी अधिकारी के रूप में उनके कार्यों के लिए उन्हें इतना स्नेह और सम्मान मिलेगा। उन्होंने अपनी माता राजेश्वरी और परिवार की ओर से उपस्थित सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से लोगों का इस तरह आना उनके लिए जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि उनकी सोच हमेशा सामाजिक न्याय, समानता और अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचाने की रही है, जो उनकी प्रशासनिक यात्रा का आधार बनी।
महिला कर्मचारी को न्याय दिलाने की कहानी
चार साल से न्याय की आस लगाए महिला कर्मचारी को दिलाई नौकरी
समारोह में वक्ताओं ने डॉ. वुडरू की संवेदनशील कार्यशैली के कई उदाहरण साझा किए। इनमें एक महिला एवं बाल विकास विभाग की कर्मचारी का मामला विशेष रूप से चर्चा में रहा, जिसे मातृत्व अवकाश नहीं मिलने के कारण सेवा से हटा दिया गया था। चार वर्षों तक न्याय की तलाश में भटकने के बाद जब वह डॉ. वुडरू के पास पहुंची, तो उन्होंने न केवल उसकी नौकरी बहाल की, बल्कि चार वर्षों के सभी सरकारी लाभ भी दिलवाए और विधिसम्मत मातृत्व अवकाश भी सुनिश्चित किया।
बाढ़ राहत कार्य में सक्रियता
बाढ़ में अधिकारी नहीं, मददगार बनकर उतरे मैदान में
महेंद्रगढ़ में एसडीएम के रूप में कार्यकाल के दौरान आई बाढ़ का प्रसंग भी समारोह में विशेष रूप से याद किया गया। बताया गया कि डॉ. वुडरू ने कार्यालय में सीमित रहने के बजाय स्वयं राहत कार्यों में भाग लिया। उन्होंने किसानों की भेड़-बकरियों को अपने कंधों पर उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में मदद की। उनकी दूरदर्शी सोच का परिणाम है कि महेंद्रगढ़ में विकसित बाजार आज क्षेत्र का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन चुका है, जहां सैकड़ों दुकानें संचालित हो रही हैं और हजारों लोगों को रोजगार मिला है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर सामाजिक न्याय की आवाज
सामाजिक न्याय की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया
डॉ. राजशेखर वुडरू ने प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ सामाजिक चिंतन को भी समान महत्व दिया। गांधी, सरदार पटेल और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों पर लिखी उनकी पुस्तक ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने दलित अधिकारों और सामाजिक समानता जैसे विषयों पर संयुक्त राष्ट्र संघ में व्याख्यान दिया और हार्वर्ड विश्वविद्यालय सहित कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया।
डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन
डॉक्यूमेंट्री में दिखाई गई संघर्ष और सेवा की यात्रा
कार्यक्रम के दौरान डॉ. वुडरू के जीवन पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री भी प्रदर्शित की गई, जिसमें उनके आंध्र प्रदेश से हरियाणा कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी बनने तक के सफर को दर्शाया गया। डॉक्यूमेंट्री में बताया गया कि उन्होंने पहले प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया, फिर भारतीय पुलिस सेवा का हिस्सा बने, लेकिन अंततः यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी बने। अपने कार्यकाल में उन्होंने आम नागरिकों की समस्याओं को प्राथमिकता दी।
1966 का दिलचस्प संयोग
1966 से जुड़ा दिलचस्प संयोग भी बना चर्चा का विषय
समारोह में यह रोचक तथ्य साझा किया गया कि जिस वर्ष 1966 में हरियाणा राज्य का गठन हुआ, उसी वर्ष डॉ. राजशेखर वुडरू का भी जन्म हुआ। वक्ताओं ने इसे प्रेरक संयोग बताते हुए कहा कि जिस राज्य के साथ उनका जन्म जुड़ा, उसी राज्य की सेवा में उन्होंने अपना पूरा प्रशासनिक जीवन समर्पित कर दिया।
जनसेवा की मिसाल
जनसेवा की मिसाल बन गई प्रशासनिक यात्रा
वक्ताओं ने कहा कि डॉ. वुडरू उन चुनिंदा अधिकारियों में से हैं जिन्होंने कभी किसी जरूरतमंद को निराश नहीं लौटाया। उन्होंने सदैव समाज के वंचित और कमजोर वर्ग के हितों को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि उनकी विदाई एक सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि जनआभार और सम्मान का ऐतिहासिक आयोजन बन गई।
