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फेफड़ों के कैंसर की जांच में लो-डोज सीटी का महत्व: जानें क्या कहती है नई समीक्षा

फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने के लिए लो-डोज सीटी की प्रभावशीलता पर एक नई समीक्षा सामने आई है। आईएआरसी द्वारा किए गए अध्ययन में यह बताया गया है कि उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों के लिए यह जांच विधि फायदेमंद हो सकती है। हालांकि, इसके साथ कुछ सावधानियों की आवश्यकता भी है, जैसे झूठे सकारात्मक परिणामों का जोखिम और अति-निदान की चिंता। जानें इस विषय पर और क्या कहती है समीक्षा और किसे हो सकती है जांच की आवश्यकता।
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फेफड़ों के कैंसर का बढ़ता खतरा


नई दिल्ली: फेफड़ों का कैंसर विश्व में कैंसर से होने वाली मौतों का प्रमुख कारण बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक समीक्षा में यह बताया गया है कि उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों के लिए लो-डोज सीटी स्कैन फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने में सहायक हो सकता है। यह अध्ययन 24 सितंबर 2026 को न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुआ। आईएआरसी की विशेषज्ञ समिति ने 17 देशों के वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के शोधों की समीक्षा के बाद लो-डोज सीटी को फेफड़ों के कैंसर की जांच के लिए एक प्रभावी विधि माना है, जो मृत्यु दर को कम करने के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती है। प्रारंभिक चरण में कैंसर की पहचान से मरीजों के उपचार की सफलता की संभावना बढ़ जाती है।


अध्ययनों से मिली पुष्टि

दो बड़े अध्ययनों ने दिखाया फायदा


अमेरिका के नेशनल लंग स्क्रीनिंग ट्रायल में लो-डोज सीटी से जांच कराने वाले उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में छाती के एक्स-रे की तुलना में फेफड़ों के कैंसर से मृत्यु का जोखिम कम पाया गया। इसी तरह, यूरोप के नेल्सन अध्ययन में भी बिना स्क्रीनिंग की तुलना में लो-डोज सीटी कराने वाले पुरुषों में मृत्यु दर कम रही। महिलाओं में भी मृत्यु दर में कमी का संकेत मिला, हालांकि आंकड़े सांख्यिकीय रूप से निर्णायक नहीं थे। आठ यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षणों की समीक्षा में से सात में लो-डोज सीटी से स्टेज-3 या स्टेज-4 फेफड़ों के कैंसर की घटनाएं कम पाई गईं, जिससे बीमारी की गंभीरता से पहले पहचान की संभावना बढ़ती है।


किसे हो सकती है जांच की आवश्यकता?

किसे हो सकती है जांच की जरूरत?


समीक्षा में 50 से 80 वर्ष की आयु के उन व्यक्तियों को उच्च जोखिम में माना गया है, जिनका धूम्रपान का लंबा इतिहास है या जो वर्तमान में धूम्रपान कर रहे हैं या हाल ही में छोड़ चुके हैं। आमतौर पर, जिन लोगों का धूम्रपान का इतिहास 20 से 30 पैक-वर्ष है, उन्हें स्क्रीनिंग पर विचार किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उम्र और धूम्रपान के वर्षों के आधार पर चयन करने के बजाय भविष्य के जोखिम का अनुमान लगाने वाले मॉडल भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। कुछ अध्ययनों में ऐसे जोखिम मॉडल से फेफड़ों के कैंसर की पहचान 5 से 20 प्रतिशत तक अधिक हुई है।


सावधानियों की आवश्यकता

फायदे के साथ सावधानियां भी जरूरी


हालांकि लो-डोज सीटी को पूरी तरह से जोखिम-मुक्त नहीं माना जा सकता। विभिन्न अध्ययनों में झूठे सकारात्मक परिणामों की दर 1 से 42 प्रतिशत तक रही है। कुछ मामलों में आगे की जांच या आक्रामक प्रक्रियाओं की आवश्यकता पड़ी, जिससे जटिलताओं का जोखिम भी बढ़ा। एक अन्य चिंता अति-निदान की है, यानी ऐसे कैंसर की पहचान जो संभवतः व्यक्ति के जीवनकाल में गंभीर समस्या नहीं पैदा करते। विभिन्न यादृच्छिक परीक्षणों में इसका अनुमान लगभग 3 से 26 प्रतिशत तक रहा। हालांकि, लंबे समय तक निगरानी वाले अध्ययनों में यह अनुमान कम पाया गया। लो-डोज सीटी से विकिरण के कारण होने वाले अतिरिक्त फेफड़ों के कैंसर का अनुमान भी लगाया गया है।


एक्स-रे की सीमाएं

सिर्फ एक्स-रे से स्क्रीनिंग पर तस्वीर साफ नहीं


आईएआरसी की समीक्षा में छाती के एक्स-रे की प्रभावशीलता लो-डोज सीटी के समान नहीं पाई गई। छाती के एक्स-रे से फेफड़ों के कैंसर की मृत्यु दर में कमी के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले और इसे इस क्षमता के आधार पर स्पष्ट रूप से वर्गीकृत नहीं किया जा सका। थूक की कोशिकीय जांच को जोड़ने से भी अतिरिक्त लाभ का ठोस प्रमाण नहीं मिला।


कृत्रिम बुद्धिमत्ता का योगदान

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बढ़ सकती है जांच की क्षमता


फेफड़ों के कैंसर की जांच में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। समीक्षा के अनुसार, एआई आधारित तकनीक सीटी स्कैन में ऐसे फेफड़ों की गांठों की पहचान में मदद कर सकती है, जिन पर आगे कार्रवाई की आवश्यकता है। खासकर कम अनुभवी रेडियोलॉजिस्ट के साथ इसका उपयोग जांच की संवेदनशीलता और गांठों के आकार के आकलन में सहायक पाया गया है। हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा प्रमाण एआई को अकेले चिकित्सक के स्थान पर उपयोग करने का समर्थन नहीं करते। एआई से झूठे सकारात्मक परिणाम और अनावश्यक जांच बढ़ने की संभावना भी रहती है।


धूम्रपान छोड़ने की आवश्यकता

स्क्रीनिंग के साथ धूम्रपान छोड़ना भी जरूरी


विशेषज्ञों ने जोर दिया कि केवल स्क्रीनिंग से फेफड़ों के कैंसर की समस्या का समाधान नहीं होगा। धूम्रपान नियंत्रण अब भी सबसे प्रभावी प्राथमिक बचाव उपाय है। स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के साथ धूम्रपान छोड़ने के लिए व्यवहारिक सहायता और दवाओं को जोड़ने से लंबे समय तक धूम्रपान छोड़ने की दर में सुधार देखा गया है। आईएआरसी के अनुसार, प्रभावी स्क्रीनिंग कार्यक्रम के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, गुणवत्तापूर्ण जांच केंद्र, गांठों की सही निगरानी, समय पर आगे की जांच और उपचार की व्यवस्था आवश्यक है। साथ ही, आर्थिक रूप से कमजोर और स्वास्थ्य सेवाओं से दूर आबादी तक पहुंच सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती है।