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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार, लेकिन नियमों का पालन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की पुष्टि की। अदालत ने कहा कि कानून और पुलिस के नियमों का पालन करना आवश्यक है। इसके साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा हुए लोगों को अवैध तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को मेट्रो सेवाओं को सामान्य रखने और इंटरनेट कनेक्शन को बाधित नहीं करने का भी निर्देश दिया गया। इस मामले में कई महत्वपूर्ण दलीलें और निर्देश दिए गए हैं, जो आगे की कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
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दिल्ली में प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी


नई दिल्ली: दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा किए गए प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबंधों पर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि नागरिकों को शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए कानून और पुलिस के नियमों का पालन करना आवश्यक है। इसके साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा हुए लोगों को अवैध तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को मेट्रो सेवाओं को सामान्य रखने और इंटरनेट कनेक्शन को बाधित नहीं करने का भी निर्देश दिया गया।


अवमानना का मामला और नोटिस

जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने विशेष सुनवाई के दौरान उस याचिका पर विचार किया, जिसमें अदालत के पुराने आदेश का पालन न होने का आरोप लगाया गया था। याचिका में दिल्ली में मेट्रो और ट्रेन सेवाओं को पूरी तरह रोकने के खिलाफ दिए गए निर्देशों के उल्लंघन पर अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई थी। पीठ ने कहा कि पहली नजर में अवमानना का मामला बनता है।


अदालत ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और डीएमआरसी की चेयरपर्सन को नोटिस जारी किया। उन्हें 13 अक्टूबर 2026 तक जवाबी हलफनामा दाखिल करने और पुराने आदेश का पालन करने की जानकारी देने को कहा गया है। फिलहाल अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने से छूट दी गई है।


इंटरनेट, मेट्रो और हिरासत पर निर्देश

पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य नागरिकों को अपने कार्य में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट सेवाएं चालू रखने के निर्देश का मतलब यह नहीं है कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत सरकार की शक्तियां समाप्त हो गई हैं। हालांकि, किसी को भी कानूनी प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जा सकता।


कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों का उपयोग निर्धारित क्षेत्र से बाहर लोगों को पकड़ने के लिए नहीं किया जा सकता। गुरुग्राम जैसे दूर के इलाकों में कार्रवाई को स्थानीय प्रतिबंधों के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के आसपास धारा 163 की जानकारी देने वाला बोर्ड हटाने का आदेश दिया गया, ताकि लोगों और वकीलों की अदालत तक पहुंच प्रभावित न हो।


वकीलों के सवाल और पुलिस कार्रवाई

राजद सांसद मनोज झा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि पुलिस ट्रेनों से यात्रियों को हिरासत में ले रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जंतर-मंतर से चार किलोमीटर दूर मौजूद लोगों को भी पकड़ा गया और अदालत के पुराने आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दावा किया कि शहर में करीब 45 हिरासत केंद्र बनाए गए और विपक्षी नेताओं समेत लगभग 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया। शनिवार को पकड़े गए अधिवक्ता शादान फरासत ने भी पुलिस कार्रवाई को दमनकारी बताया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार बहाल करने की मांग की। वहीं, गोपाल शंकरनारायणन ने बैरिकेड हटाने और आवाजाही सामान्य करने की अपील की।


सरकार की दलीलें

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 10 अक्टूबर को 303 में से केवल 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोका गया था। उनके अनुसार, यह कुल नेटवर्क का लगभग 15 प्रतिशत था। उन्होंने यह भी कहा कि इंटरनेट सेवा बहाल कर दी गई है और सभी मेट्रो स्टेशन चालू हैं। हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई से जुड़ी कुछ याचिकाएं अब प्रासंगिक नहीं रहीं, क्योंकि अधिकतर लोगों को छोड़ दिया गया है। अदालत के सामने राजनीतिक नेताओं की हिरासत से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका और अवमानना याचिका भी लंबित हैं। इससे पहले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रदर्शन के कारण मेट्रो और दिल्ली आने वाली ट्रेनों का संचालन पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन आम लोगों को बेवजह परेशान नहीं किया जाना चाहिए।