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धार की भोजशाला: 700 वर्षों की प्रतीक्षा का अंत

धार की भोजशाला, जो सदियों से पूजा की अनुमति की प्रतीक्षा कर रही थी, अब अपने ऐतिहासिक क्षण का स्वागत कर चुकी है। राजा भोज द्वारा स्थापित इस मंदिर ने 700 वर्षों में कई आक्रमणों का सामना किया है। हाल ही में एमपी हाईकोर्ट ने इसे मंदिर घोषित किया, जिससे भक्तों में खुशी की लहर दौड़ गई है। अब सभी की नजरें मां वाग्देवी की दुर्लभ प्रतिमा पर हैं, जो लंदन में है। जानें इस अद्भुत धरोहर और इसके महत्व के बारे में।
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धार की भोजशाला: 700 वर्षों की प्रतीक्षा का अंत

धार की भोजशाला का ऐतिहासिक महत्व

सनातन धर्म के अद्भुत वैभव का प्रतीक धार की भोजशाला, जिसे सदियों से इस क्षण का इंतजार था, अंततः अपने लक्ष्य को प्राप्त कर चुकी है। यह केवल धार के निवासियों की ही नहीं, बल्कि कटक से लद्दाख और लक्षद्वीप तक के लोगों की भी आकांक्षा थी। यह उन भक्तों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो मां वाग्देवी के मंदिर के प्रति अपने सपनों को संजोए हुए थे।


राजा भोज और भोजशाला का इतिहास

करीब 700 वर्षों में परमार वंश के महान राजा भोज की आराध्य वाग्देवी का यह मंदिर कई आक्रमणों का सामना करते हुए आज भी अपनी महिमा को बनाए हुए है। इसने विदेशी आक्रांताओं से अपनी धरोहर की रक्षा की और इसके स्वामित्व के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई, जो अपने आप में एक रोमांचक कहानी है।


राजा भोज का योगदान

राजा भोज, जो 1010 से 1055 ईस्वी तक शासन करते थे, एक महान विद्वान थे। उन्होंने 1034 ईस्वी में भोजशाला का निर्माण कराया, जिससे धार नगरी को कला और शिक्षा का केंद्र बनाया गया।


भोजशाला की अद्भुत वास्तुकला

राजा भोज ने नालंदा और तक्षशिला की तर्ज पर यहां संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित किए, जहां विद्वान और शोधार्थी वेद-उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों का अध्ययन करते थे। भोजशाला में मौजूद 188 स्तंभ इस बात का प्रमाण हैं कि कैसे सनातन धर्म ने कठिनाइयों का सामना किया।


भोजशाला की दीवारों की कहानी

भोजशाला के मुख्यद्वार से प्रवेश करते ही काले पाषाण पर उत्कीर्ण प्राकृत और संस्कृत शब्दों पर नजरें टिक जाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये पारिजात मंजरी नाट्य के लिपिबद्ध शब्द हैं।


हवनकुंड का पुनर्निर्माण

भोजशाला के बीच में विशाल हवनकुंड है, जिसका निर्माण प्राचीन ज्ञान और विज्ञान की समृद्धि को दर्शाता है। हर साल वसंत पंचमी पर राजा भोज भव्य आयोजन करते थे, जिसमें सरस्वती यज्ञ का विशेष महत्व होता था।


भोजशाला का अद्भुत धरोहर

परमार काल में विज्ञान, ज्ञान, कला और स्थापत्य के क्षेत्र में काफी उन्नति हुई थी। भोजशाला में गुंबद की नक्काशी और सरस्वती कूप जैसे अद्भुत निर्माण हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्धि को दर्शाते हैं।


कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

एमपी हाईकोर्ट ने भोजशाला को मंदिर घोषित करते हुए पूजा की परंपरा को बहाल किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि यहां पूजा की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई।


वाग्देवी की प्रतिमा की प्रतीक्षा

अब भक्तों को मां वाग्देवी की दुर्लभ प्रतिमा का इंतजार है, जो 1875 में लंदन ले जाई गई थी। यह प्रतिमा 1034 ईस्वी में बनाई गई थी और अब इसे वापस लाने की तैयारी की जा रही है।