बहुदा रथ यात्रा 2026: तिथि, महत्व और अनुष्ठान
Jagannath Bahuda Rath Yatra 2026
इस वर्ष बहुदा रथ यात्रा का आयोजन 24 जुलाई 2026 को होगा। यह पवित्र पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपनी नौ दिवसीय यात्रा पूरी करके गुंडिचा मंदिर से वापस श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी लौटते हैं।
यह यात्रा ओडिशा के पुरी धाम की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में से एक है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन और रथ खींचने के लिए शामिल होते हैं.
बहुदा यात्रा का महत्व
बहुदा यात्रा को भगवान जगन्नाथ की वापसी यात्रा के रूप में जाना जाता है। रथ यात्रा के दौरान भगवान अपने भाई-बहन के साथ श्री मंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, जिसे उनकी मौसी का घर माना जाता है। वहां नौ दिनों तक विश्राम और भक्तों को दर्शन देने के बाद भगवान अपने मूल स्थान श्री जगन्नाथ मंदिर वापस आते हैं।
यह यात्रा इस बात का प्रतीक है कि भगवान अपने भक्तों के बीच रहने के बाद फिर से अपने दिव्य निवास में लौटते हैं। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और आस्था का अद्भुत उत्सव है।
आध्यात्मिक महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, बहुदा यात्रा में शामिल होना और भगवान के रथ की रस्सी खींचना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि इससे व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है और मोक्ष की राह आसान होती है।
यह पर्व मनुष्य के जीवन में सकारात्मक बदलाव, आत्मिक शुद्धि और ईश्वर के प्रति विश्वास को मजबूत करने का संदेश देता है।
मुख्य अनुष्ठान
पहंडी अनुष्ठान: बहुदा यात्रा की शुरुआत पहंडी परंपरा से होती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को विशेष विधि-विधान के साथ गुंडिचा मंदिर से बाहर लाया जाता है।
छेरा पहंरा रस्म: रथों के आगे बढ़ने से पहले पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं। यह परंपरा समानता और विनम्रता का प्रतीक है।
मौसी मां मंदिर में विश्राम: वापसी यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के रथ मौसी मां मंदिर के पास कुछ समय के लिए रुकते हैं। यहां भगवान को विशेष प्रसाद के रूप में पोड़ा पीठा अर्पित किया जाता है।
विशेष आयोजन
श्री जगन्नाथ मंदिर पहुंचने के बाद भी उत्सव जारी रहता है। इसके बाद भगवान का भव्य सुनाबेश आयोजित किया जाता है।
इसके बाद नीलाद्रि बीजे की रस्म होती है, जिसमें भगवान को विधिपूर्वक मंदिर के गर्भगृह में पुनः स्थापित किया जाएगा।
