भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा 2026: पिशि मां का महत्व
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का आयोजन
16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा
ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह पावन पर्व हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं और अपनी मौसी गुंडिचा देवी के मंदिर में जाते हैं।
श्रद्धालुओं की भागीदारी
हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस रथयात्रा में भाग लेते हैं और रथों की रस्सियों को खींचकर पुण्य अर्जित करते हैं। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी से मिलने जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे अपनी बुआ कुंती से भी मिलने के लिए जाते हैं?
महाभारत की कथा का संदर्भ
ओड़िया भाषा में 'पिशि' का अर्थ बुआ होता है। महाभारत के अनुसार, माता कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं। कुंती के पिता राजा शूरसेन और भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव सगे भाई थे। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ पिशी मां की कुटिया में अवश्य जाते हैं। इस मंदिर के चारों ओर एक तालाब है, जहां भगवान अपनी बुआ के साथ नौका विहार करते हैं।
पिशि मां के मंदिर का महत्व
इस मंदिर में देवी कुंती के साथ 5 पांडवों की प्रतिमाएं भी हैं। यहां भगवान श्रीकृष्ण की पूजा माता कुंती के साथ की जाती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी भी यहां विराजमान हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपनी बुआ से बहुत प्रेम करते थे और उन्होंने वादा किया था कि रथयात्रा के दौरान वे उनके घर अवश्य आएंगे।
रथ का मंदिर के सामने रुकना
रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ पिशि मां के मंदिर के सामने कुछ समय के लिए रोका जाता है। जब भगवान यहां आते हैं, तो उन्हें पोडा पीठा का भोग अर्पित किया जाता है। माना जाता है कि जब तक उन्हें पिशि मां की कुटिया में ले जाकर पोडा पीठा का भोग नहीं लगाया जाता, तब तक भगवान की यात्रा अधूरी मानी जाती है।
