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मां कूष्मांडा की पूजा: विधि, भोग और मंत्र

नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन भक्तजन मां को मालपुए, दही और हलवे का भोग अर्पित करते हैं। पूजा के दौरान मंत्रों का जाप और चालीसा का पाठ किया जाता है। जानें मां कूष्मांडा की आराधना की विधि, भोग और प्रभावशाली मंत्रों के बारे में।
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मां कूष्मांडा की आराधना का महत्व


नई दिल्ली. नवरात्रि के इस पावन पर्व का आज चौथा दिन है, जो मां कूष्मांडा की पूजा के लिए समर्पित है। 14 अक्टूबर, बुधवार को भक्तजन मां की आराधना करते हैं। हिन्दू धर्म में मां कूष्मांडा की पूजा से सुख, समृद्धि और खुशहाली की प्राप्ति होती है। मां दुर्गा का यह स्वरूप अपनी अद्भुत शक्ति और तेज के लिए प्रसिद्ध है।


पूजा विधि और भोग

इस दिन भक्तजन व्रत रखते हैं और मां को प्रसन्न करने के लिए मंत्रों का जाप करते हैं। चालीसा का पाठ और आरती भी की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां कूष्मांडा को सृष्टि का रचयिता माना जाता है। उनके नाम में सृजन और ऊर्जा का भाव छिपा है। मां के आठ भुजाएं हैं, इसलिए उन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है।


मां कूष्मांडा की पूजा: विधि, भोग और मंत्र


नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा को मालपुए का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके साथ ही दही और हलवे का भोग भी चढ़ाया जा सकता है। पूजा के समय स्वच्छता का ध्यान रखना आवश्यक है। श्रद्धा पूर्वक फल, फूल और प्रसाद अर्पित करें और फिर मां की आरती कर परिवार की सुख-शांति की कामना करें।


मां कूष्मांडा के मंत्र

1. पूजा मंत्र:
ॐ कूष्माण्डायै नमः।


2. ध्यान मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥


मंत्रों का जाप करते समय मन को शांत रखें और मां का ध्यान करें।


मां कूष्मांडा चालीसा का पाठ

नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा चालीसा का पाठ करना विशेष महत्व रखता है। पूजा के दौरान मां के गुणों का ध्यान करें और उनसे सुख, शांति तथा संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करें। चालीसा का पाठ अपनी श्रद्धा और सुविधानुसार किया जा सकता है।


मां कूष्मांडा की आरती

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥


पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी माँ भोली भाली॥


लाखों नाम निराले तेरे ।
भक्त कई मतवाले तेरे॥


भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥


सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुँचती हो माँ अंबे॥


तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥


माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥


तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥


मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥


तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥