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कर्नाटक के किसान ने छोटी लौकी की खेती से बदली किस्मत, रोजाना 50,000 रुपये की कमाई

कर्नाटक के एक प्रगतिशील किसान करिगौड़ा ने पारंपरिक खेती को छोड़कर छोटी लौकी की खेती शुरू की है, जिससे वह रोजाना 50,000 रुपये तक की कमाई कर रहे हैं। उनकी खेती की तकनीक और बाजार की समझ ने उन्हें सफलता दिलाई है। जानें कैसे उन्होंने 3.5 एकड़ में बेबी बॉटल गार्ड की खेती कर 45 लाख रुपये का टर्नओवर हासिल किया।
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किसान करिगौड़ा की अनोखी खेती

बेंगलुरु: देशभर के लाखों किसान जहां सम्मान निधि की अगली किस्त का इंतजार कर रहे हैं, वहीं कर्नाटक के एक प्रगतिशील किसान ने खेती के नए तरीके अपनाकर एक मिसाल पेश की है। बेंगलुरु अर्बन जिले के कल्लुरुपाल्या गांव के निवासी करिगौड़ा ने पारंपरिक खेती को छोड़कर विदेशी बाजार की मांग को समझा और छोटी लौकी (बेबी बॉटल गार्ड) की खेती शुरू की। आज उनकी उगाई लौकी की खाड़ी देश कतर में जबरदस्त मांग है, जिससे वह प्रतिदिन 50,000 रुपये तक की बिक्री कर रहे हैं।


3.5 एकड़ में बेबी बॉटल गार्ड की खेती

करिगौड़ा ने पारंपरिक फसलों जैसे मक्का और सामान्य टमाटर की अनिश्चितता से परेशान होकर 3.5 एकड़ में छोटी लौकी की खेती शुरू की। वह 'Swikar 045 F1' किस्म की लौकी उगाते हैं, जिसे कच्ची अवस्था में ही तोड़ लिया जाता है। कटाई के समय उनके खेत से रोजाना लगभग 1 टन छोटी लौकी निकलती है, जिसे स्थानीय ब्रोकर सीधे कतर भेजते हैं।


70 दिन में पहली फसल, 90 दिनों में 45 लाख की बिक्री

करिगौड़ा के अनुसार, इस किस्म की बुवाई जून-जुलाई में होती है और लगभग 70 दिन बाद पहली कटाई होती है। सितंबर से दिसंबर तक चलने वाले 90 दिनों के हार्वेस्टिंग सीजन में उनकी पैदावार लगातार मिलती है। ₹50 प्रति किलो के थोक मूल्य पर रोजाना लगभग 50,000 रुपये की लौकी बिकती है, जिससे महीने का टर्नओवर ₹14 से ₹15 लाख होता है। इस तरह पूरे सीजन में करीब 45 लाख रुपये की बिक्री होती है।


आधुनिक तकनीक से खेती में सुधार

करिगौड़ा ने खेती को अधिक लागत-प्रभावी और टिकाऊ बनाने के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाया है। उन्होंने ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग शीट का उपयोग किया है, जिससे पानी और पोषक तत्व सीधे जड़ों तक पहुंचते हैं और खरपतवार नियंत्रित रहते हैं।


साल भर की कमाई का मॉडल

करिगौड़ा केवल एक फसल पर निर्भर नहीं रहते। लौकी की फसल के चार महीने बाद, वह टमाटर और बैंगन की खेती करते हैं। उनके बैंगन की सप्लाई तमिलनाडु की होसुर मंडी में होती है, जहां उन्हें ₹45 प्रति किलो तक का अच्छा मूल्य मिलता है। उनकी यह वैज्ञानिक और बाजार-आधारित रणनीति उन किसानों के लिए प्रेरणा है जो पारंपरिक फसलों में घाटे का सामना कर रहे हैं।