कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी: पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को समर्पित है और इसका विशेष महत्व है। इस दिन पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक मान्यता के बारे में जानें। 03 जुलाई को होने वाले इस व्रत में सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा, जो पूजा को और फलदायी बनाता है। जानें इस दिन की पूजा विधि और सही समय, ताकि आप भगवान गणेश की कृपा प्राप्त कर सकें।
| Jul 1, 2026, 14:09 IST
संकष्टी चतुर्थी का महत्व
हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का अत्यधिक महत्व है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है और हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा की जाती है।
धार्मिक मान्यता
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा और व्रत करने से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है। भक्तों पर उनकी कृपा बनी रहती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी की तिथि
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी की तिथि
द्रिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष आषाढ़ के महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 03 जुलाई को सुबह 11:20 बजे से शुरू होगी और 04 जुलाई को दोपहर 12:39 बजे तक रहेगी।
इस दिन चंद्रोदय का विशेष ध्यान रखा जाता है, जो 03 जुलाई को 9:53 बजे होगा। इसलिए इस दिन व्रत रखा जाएगा।
शुभ मुहूर्त
जानिए कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त
इस बार ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:07 से 04:47 बजे तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त 11:57 से 12:52 बजे तक होगा। गणेश जी की पूजा का लाभ-उन्नति मुहूर्त 07:12 से 08:56 बजे तक रहेगा।
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त 08:56 से 10:41 बजे तक रहेगा।
सर्वार्थ सिद्धि योग
सर्वार्थ सिद्धि योग में करें गणेश का पूजन
इस बार कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा, जो सुबह 05:28 से 11:46 बजे तक रहेगा। इस योग में गणेश जी की पूजा करना विशेष फलदायी होगा।
पूजा विधि
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजा विधि
- इस दिन सुबह जल्दी उठकर घर की सफाई करें और स्नान करें।
- भगवान गणेश की पूजा के लिए संकल्प लें और उनकी मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर पूजा करें।
- पूजा में दीप, धूप, फल, फूल आदि का प्रयोग करें। इसके बाद गणेश जी की कथा सुनें और भजन कीर्तन करें।
- व्रत के अंत में भगवान गणेश को अर्पित किया गया प्रसाद ग्रहण करें।
- इसके बाद व्रत की पूर्णता का संकल्प लें।
