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पितृ पक्ष 2026: श्राद्ध के विशेष दिन और उनका महत्व जानें

पितृ पक्ष 2026 में श्राद्ध के विशेष दिन और उनके महत्व को जानें। इस समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर मिलता है। महाभरणी, मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या जैसे महत्वपूर्ण दिन विशेष धार्मिक मान्यता रखते हैं। जानें कब मनाए जाएंगे ये दिन और कैसे करें श्राद्ध।
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पितृ पक्ष का महत्व


नई दिल्ली: सनातन संस्कृति में पूर्वजों का स्थान अत्यंत पवित्र और सम्माननीय माना जाता है। पितृ पक्ष, जिसे श्राद्ध महालय भी कहा जाता है, अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। मान्यता है कि इस समय पितर सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं और परिवार के सदस्यों द्वारा किए गए तर्पण और दान से संतुष्ट होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।


महाभरणी श्राद्ध का महत्व

महाभरणी श्राद्ध का नाम भरणी नक्षत्र से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि परिवार में किसी सदस्य की असामयिक मृत्यु हुई हो या वे अविवाहित रहे हों, तो इस दिन उनका श्राद्ध करना विशेष फलदायी माना जाता है। इसके अलावा, किसी परिजन के निधन का एक वर्ष पूरा होने पर भी इस तिथि का महत्व बढ़ जाता है। वर्ष 2026 में महाभरणी श्राद्ध 29 सितंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा।


मातृ नवमी: महिला पूर्वजों के लिए विशेष दिन

पितृ पक्ष की नवमी तिथि विशेष रूप से दिवंगत महिला पूर्वजों जैसे माता, दादी, नानी, बहन या सास की याद में समर्पित होती है। इसे मातृ श्राद्ध भी कहा जाता है। यदि किसी कारणवश परिवार की किसी महिला सदस्य के निधन की सही तिथि याद नहीं है, तो मातृ नवमी के दिन उनके नाम से तर्पण, दान और कन्या भोज कराना सबसे उचित माना जाता है। इस साल मातृ नवमी 4 अक्टूबर, रविवार को मनाई जाएगी।


सर्वपितृ अमावस्या: पितृ पक्ष का अंतिम और महत्वपूर्ण दिन

पितृ पक्ष का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है, जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है। यह पूरे पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। यदि किसी पूर्वज के निधन की सही तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश श्राद्ध नहीं किया गया है, तो इस दिन सभी पितरों का एक साथ तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान से सभी पूर्वज प्रसन्न होकर अपने लोक लौटते हैं। इस साल सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को पड़ेगी।


क्या सिर्फ इन तीन दिनों में ही करना चाहिए श्राद्ध?

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, व्यक्ति का जिस तिथि पर निधन हुआ हो, पितृ पक्ष की उसी तिथि पर उनका तर्पण करना प्राथमिक नियम है। जैसे, यदि किसी का निधन द्वितीया या अष्टमी तिथि को हुआ है, तो उनका श्राद्ध उसी तिथि पर करना चाहिए। उपरोक्त तीन तिथियों का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि ये विशेष परिस्थितियों के लिए एक सरल और धार्मिक मार्ग प्रदान करती हैं।


वर्ष 2026 में पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर को, प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर को और द्वितीया श्राद्ध 28 सितंबर को होगा। इसके बाद तृतीया और महाभरणी श्राद्ध 29 सितंबर को, चतुर्थी व पंचमी श्राद्ध 30 सितंबर को मनाए जाएंगे। षष्ठी श्राद्ध 1 अक्टूबर, सप्तमी श्राद्ध 2 अक्टूबर और अष्टमी श्राद्ध 3 अक्टूबर को होगा। नवमी यानी मातृ नवमी श्राद्ध 4 अक्टूबर को, दशमी श्राद्ध 5 अक्टूबर को और एकादशी श्राद्ध 6 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इसके बाद द्वादशी व मघा श्राद्ध 7 अक्टूबर, त्रयोदशी श्राद्ध 8 अक्टूबर और चतुर्दशी श्राद्ध 9 अक्टूबर को पड़ेगा। अंत में सर्वपितृ अमावस्या के साथ 10 अक्टूबर को पूरा पितृ पक्ष संपन्न होगा।