बाबा नीम करौली की अद्भुत कहानी: जब प्रधानमंत्री को मिला था इनकार
बाबा नीम करौली का अद्वितीय अनुभव
देहरादून: अध्यात्म की दुनिया में सत्ता का प्रभाव अक्सर नगण्य हो जाता है। बाबा नीम करौली, जिन्हें हनुमान जी का अनन्य भक्त और चमत्कारी संत माना जाता है, के निधन के कई दशकों बाद भी उनकी भक्ति में कमी नहीं आई है। उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग आज भी यह सिखाता है कि भक्त और भगवान के बीच न तो पद का महत्व है और न ही प्रोटोकॉल का।
कानपुर में बाबा का प्रवचन
यह घटना तब की है जब बाबा कानपुर के सरसैया घाट पर ठहरे हुए थे। वहां लगभग 200 भक्त उनके दर्शन और प्रवचन सुनने के लिए एकत्रित हुए थे। इसी दौरान कानपुर के डीएसपी कुछ पुलिसकर्मियों के साथ आए और बताया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और वरिष्ठ नेता गुलजारीलाल नंदा बाबा से मिलना चाहते हैं।
प्रधानमंत्री का इनकार
प्रधानमंत्री को मिला था मना
डीएसपी के अनुरोध पर बाबा ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया। पुलिस अधिकारियों ने सोचा कि चूंकि मामला प्रधानमंत्री का है, उन्हें अंदर ले जाना चाहिए। जैसे ही लाल बहादुर शास्त्री और गुलजारीलाल नंदा बाबा की ओर बढ़े, एक अद्भुत घटना घटी।
बाबा अचानक एक दिव्य प्रकाश में विलीन हो गए और वहां से अदृश्य हो गए। प्रधानमंत्री और उनके सुरक्षाकर्मी हैरान रह गए, लेकिन बाबा का कहीं पता नहीं चला। कुछ समय बाद जब बाबा प्रकट नहीं हुए, तो दोनों नेताओं को बिना मिले लौटना पड़ा।
बाबा की सच्चाई
नेताओं के जाने के थोड़ी देर बाद, बाबा फिर से भक्तों के बीच आकर बैठ गए। यह देखकर वहां उपस्थित लोग चकित रह गए।
सादा भक्त बनकर आते तो जरूर मिलता
एक भक्त ने बाबा से पूछा कि उन्होंने प्रधानमंत्री से मुलाकात क्यों नहीं की। बाबा ने उत्तर दिया कि जब मैं आम और खास भक्त में भेद नहीं करता, तो उन्हें भी साधारण बनकर आना चाहिए था। उन्होंने मेरे और भक्तों के बीच पुलिस की दीवार क्यों खड़ी की?
अगर वे एक सामान्य व्यक्ति की तरह आते, तो मैं अवश्य मिलता। बाबा का कहना था कि अध्यात्म के मार्ग में पद और अहंकार का कोई स्थान नहीं होता। भक्त और भगवान का संबंध केवल श्रद्धा और सच्चे मन से बनता है।
बाबा की सीख आज भी प्रासंगिक
आज भी बरकरार है बाबा की सीख
इस घटना के माध्यम से बाबा ने स्पष्ट कर दिया कि उनके दर पर वीवीआईपी संस्कृति का कोई स्थान नहीं है। आज भी कैंची धाम में बड़े नेता बिना किसी विशेष सुविधा के आम भक्त की तरह ही दर्शन के लिए लाइन में लगते हैं।
बाबा नीम करौली की यह सीख आज भी लोगों को याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति में न तो पद का महत्व होता है और न ही प्रोटोकॉल का, केवल निष्कपट मन और आस्था मायने रखती है।
