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मां चंद्रघंटा की आराधना: शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन का महत्व

शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन देवी की आराधना से साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। जानें पूजा विधि, मंगल दोष से राहत के उपाय और मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा के बारे में। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कैसे इस दिन की पूजा से आपके जीवन में सकारात्मकता आ सकती है।
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मां चंद्रघंटा की पूजा का महत्व


नई दिल्ली: शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे रूप, मां चंद्रघंटा की पूजा का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष, 13 अक्टूबर को मां चंद्रघंटा की आराधना की जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह देवी साहस, शक्ति और शांति का प्रतीक मानी जाती हैं। उनके सिर पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिसके कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मां के दस भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं और उनका वाहन सिंह है। मान्यता है कि मां की पूजा से भय का नाश होता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।


मां चंद्रघंटा की पूजा विधि

नवरात्र के तीसरे दिन, सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद, पूजा स्थल की सफाई करें और मां चंद्रघंटा के समक्ष दीपक जलाएं। देवी को लाल फूल, लाल चुनरी, अक्षत और चंदन अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर मां की आरती करें और मंत्रों का जाप करें।


मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग अर्पित करने की परंपरा है। पूजा के अंत में देवी से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें। प्रसाद को परिवार के सदस्यों में बांटें।


मंगल दोष से राहत के उपाय

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा का संबंध मंगल ग्रह से है। यदि कुंडली में मंगल कमजोर है या मंगल दोष है, तो इस दिन देवी की पूजा करना शुभ माना जाता है। इसके लिए मां को लाल फूल और तांबे की वस्तु अर्पित करें। हलवा या मेवे का भोग लगाकर श्रद्धापूर्वक पूजा करें।


इसके बाद 'ॐ अं अंगारकाय नमः' मंत्र का जाप करें। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से साहस और सकारात्मकता में वृद्धि होती है। हालांकि, इन उपायों के प्रभाव का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।


मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। परेशान देवताओं ने भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश से सहायता मांगी। इसके बाद तीनों देवताओं की शक्तियों से देवी दुर्गा प्रकट हुईं। सभी देवताओं ने उन्हें अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। सिंह पर सवार होकर देवी ने महिषासुर और उसकी सेना से युद्ध किया। अंत में उन्होंने राक्षस का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्त कराया। मां चंद्रघंटा का स्वरूप इसी शक्ति और वीरता का प्रतीक माना जाता है। भक्त मानते हैं कि उनकी आराधना से मन में निर्भयता आती है और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है।