राम मंदिर की पहली वर्षगांठ: एक नई बहस का आरंभ
राम मंदिर की पहली वर्षगांठ पर विचार
मैंने उस समय को देखा है जब चौधरी चरण सिंह ने 'असली भारत' की बात करते हुए प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। फिर वह समय आया जब नरेंद्र मोदी ने हिंदू भारत की बात की। इन दोनों समयों का परिणाम क्या है? आम हिंदुओं को धोखा। आज का किसान, जो राम के नाम पर संघ और भाजपा को समर्थन देता है, अपने धर्म की स्थिति को देखकर चिंतित है। 1990 की राम रथ यात्रा से लेकर 2026 में राम मंदिर के इतिहास पर विचार करें।
इतिहास में गजनवी बार-बार मंदिरों को लूटने के लिए भारत आता था। अब वही हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र के रूप में मंदिरों को लूटने की नई व्यवस्थाएं लेकर आया है।
क्या मैं गलत हूं? क्या यह विचित्र हिंदू भारत नहीं है? एक ऐसा भारत जिसमें संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व की कमी है। मैंने हाल ही में एक टीवी चैनल पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों को सुना। उनके चेहरे पर कोई शर्म या ग्लानि नहीं थी। उन्होंने कहा कि हमने मर्यादा का पालन किया है।
क्या आदित्यनाथ ने गोरख परंपरा के कर्तव्यों को समझा है? देवस्थान की रक्षा और दान-संपत्ति का संरक्षण उनका परम धर्म है। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी जिम्मेदारी है कि भक्तों द्वारा दिए गए दान का उपयोग धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए होना चाहिए।
अयोध्या में चढ़ावे की चोरी से राम के नाम की बदनामी दूसरी क्या हो सकती है? बाबर ने मंदिरों को ढहाया, लेकिन चंपत राय और उनके साथी ने हिंदू आस्था पर बुलडोजर चलाया है।
इसलिए सवाल यह है कि गोरख संप्रदाय के एक महंत के मुख्यमंत्री काल में, आरएसएस के ट्रस्ट की व्यवस्थाओं में चोरी की यह बदनामी किस भारत का प्रतीक है? कबीरदास का यह दोहा आज के हिंदू भारत का सही चित्रण करता है: 'राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंत काल पछताएगा, प्राण जाएंगे छूट।'
आज का हिंदू भारत एक ऐसा समय है जिसमें पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। दूसरे धर्मों ने हिंदुओं को लूटा, लेकिन हिंदू हमेशा अपने धर्म के सदाचार में जीते रहे। आज चढ़ावे की चोरी का नया भारत और सनातनी भारत दोनों एक साथ हैं।
