शिक्षा में राजनीतिकरण: छोटे प्रधानों पर दोषारोपण क्यों है व्यर्थ?
शिक्षा का संकट और राजनीतिक हस्तक्षेप
शिक्षा के क्षेत्र में जो समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं, उनके लिए छोटे प्रधानों को दोष देना निरर्थक है। आजकल औपचारिक और वास्तविक अधिकारों में इतना भेद है कि यह एक नई समस्या बन गई है। वर्तमान समय में दोहरी व्यवस्था और दोहरे मानदंडों का बोलबाला है। जब राष्ट्रीय हित पर दलीय स्वार्थ हावी हो जाता है, तो परिणामस्वरूप पतन की सीढ़ी पर चढ़ना ही होता है।
शैक्षिक संस्थानों में भ्रष्टाचार और गड़बड़ी के लिए छोटे प्रधानों को बकरा बनाना एक भटकाव है। क्या सभी निर्णय केवल उन्हीं के द्वारा लिए जाते हैं? जो लोग शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े हैं, वे इस सच को भली-भांति जानते हैं।
हाल के वर्षों में जो निर्णय लिए जा रहे हैं, उनमें आयोग, अकादमियाँ, और विश्वविद्यालय शामिल हैं। क्या इन निर्णयों में औपचारिक प्रधान स्वतंत्र हैं? यह एक गंभीर प्रश्न है।
शिक्षा के क्षेत्र में दलीय स्वार्थ का बढ़ता राजनीतिकरण एक गंभीर चिंता का विषय है। यह स्थिति विद्वानों की सलाह को दरकिनार कर रही है और संस्थानों के प्रमुखों को केवल रुटीन प्रशासक बना रही है।
अब विद्वानों का स्थान लगभग समाप्त हो चुका है। संस्थानों के प्रमुख अक्सर दिखावे के लिए काम कर रहे हैं, जबकि उनके पीछे अनौपचारिक दबाव होता है। यह सब शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।
यदि हम शिक्षा के उद्देश्य को समझना चाहते हैं, तो हमें इसे राजनीति से मुक्त करना होगा। तभी हम अन्य समस्याओं का समाधान कर सकेंगे।
