श्रीकृष्ण की लीला: दिव्य संदेश और भक्ति का महत्व
श्रीकृष्ण की लीला और ब्रह्माजी की परीक्षा
महाराज परीक्षित ने गोस्वामी शुकदेव जी से पूछा कि ग्वालों ने अघासुर की मृत्यु के बाद उसकी चर्चा एक वर्ष तक क्यों नहीं की। इस संदर्भ में यह भी बताया गया कि ब्रह्माजी ने भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए ग्वालबालों और बछड़ों का अपहरण कर लिया। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सभी ग्वालों और बछड़ों का अपहरण ब्रह्माजी ने किया है, जिससे वह वृन्दावन नहीं जा पाएंगे। इस स्थिति में, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला के माध्यम से ग्वालों और बछड़ों के रूप में अपने आप को विस्तारित किया। विष्णु पुराण में कहा गया है कि इस दृश्य जगत में जो कुछ भी है, वह भगवान की शक्तियों का विस्तार है। इस प्रकार, श्रीकृष्ण ने वृन्दावन में प्रवेश किया, जबकि ब्रजवासियों को इस घटना की कोई जानकारी नहीं थी।
जब ब्रह्माजी को श्रीकृष्ण की अनंत शक्ति का एहसास हुआ, तो उन्होंने अपने वाहन हंस से उतरकर बार-बार माफी मांगी। ब्रह्मा ने कहा, 'हे भगवान! आप ही एकमात्र आराध्य हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपका शरीर जलपूरित बादलों के रंग का है और आप पीताम्बर धारण किए हुए हैं। मैं महाराज नन्द के पुत्र को बार-बार नमस्कार करता हूँ। आप अपने बाल-मित्रों के साथ खेल रहे हैं, लेकिन आपके और मेरे शरीर में इतना अंतर है कि मैं आपकी शक्ति का अनुमान नहीं लगा सकता।' उन्होंने यह भी कहा कि भक्ति के बिना आपको समझने की सभी विधियाँ व्यर्थ हैं।
श्रीकृष्ण की हर लीला मानवता के लिए एक संदेश है। श्रीमद्भागवत गीता का संदेश जीवन में अपनाकर हर प्राणी इस मायामयी भवसागर से पार हो सकता है।
श्रीकृष्ण के जन्म पर्व पर गीता के संदेश को अपनाने का संकल्प लें और श्रीकृष्ण की शरण में आकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं।
