सावन में बेटियों के मायके आने का महत्व और स्वागत की परंपरा
सावन का महीना केवल भगवान शिव की पूजा का समय नहीं है, बल्कि यह पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने का भी अवसर है। विवाहित बेटियों का मायके आना इस महीने की एक महत्वपूर्ण परंपरा है, जो उनके और परिवार के बीच भावनात्मक संबंधों को बढ़ाती है। इस लेख में जानें कि कैसे बेटियों का स्वागत किया जाता है और इस परंपरा का महत्व क्या है।
| Aug 10, 2026, 10:24 IST
सावन का पवित्र महीना और पारिवारिक रिश्ते
सावन के इस पवित्र महीने में केवल भगवान शिव की पूजा नहीं होती, बल्कि यह पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में विवाहित महिलाओं को अपने मायके अवश्य जाना चाहिए। ऐसा करने से उनकी अपने मायके के साथ संबंध और भी मधुर बनते हैं।
बेटियों के मायके आने का महत्व
धार्मिक दृष्टिकोण से, विवाह के बाद विवाहित बेटियों का सावन में मायके आना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे परिवार के सदस्यों को मानसिक और भावनात्मक सुख की प्राप्ति होती है। अक्सर देखा जाता है कि जब बेटियों की शादी हो जाती है, तो उनका मायका सुनसान सा लगने लगता है।
इसलिए, सावन में बेटियों का मायके आना घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनाए रखने में सहायक होता है। यह परंपरा नवविवाहित बेटियों के लिए विशेष मानी जाती है, लेकिन जिन महिलाओं की शादी को काफी समय हो चुका है, वे भी इस परंपरा का पालन करती हैं।
पहली बार मायके आई बेटी का स्वागत
सावन के महीने में जब बेटी अपने ससुराल से मायके आती है, तो उनका स्वागत पवित्रता और सादगी से करना चाहिए। सबसे पहले, बेटी की दहलीज पर आरती उतारें।
इसके बाद, बेटी के माथे पर रोली, अक्षत और चंदन लगाएं।
बड़े पात्र में बेटी के पैरों को साफ पानी से धोकर अच्छे से पोंछें।
फिर, सावन से जुड़े विशेष पकवान जैसे खीर, मालपुआ और घेवर जैसे मिठाई खिलाकर बेटी का मुंह मीठा करें।
इसके बाद, शादीशुदा बेटी के हाथों से घर में तुलसी का पौधा लगवाना भी शुभ माना जाता है। अंत में, बेटी को सोलह श्रृंगार का सामान भेंट करें।
