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राजस्थान की पहली महिला मुक्केबाज अरुंधति चौधरी की ऐतिहासिक जीत

राजस्थान की पहली महिला मुक्केबाज अरुंधति चौधरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर एक नई मिसाल कायम की है। हालांकि, उन्हें राज्य सरकार से कोई प्रोत्साहन नहीं मिला है। इस लेख में जानें उनकी प्रेरणा, परिवार का योगदान और राजस्थान में मुक्केबाजी की सुविधाओं की कमी के बारे में।
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अरुंधति चौधरी की गोल्ड मेडल जीतने की कहानी

राजस्थान की पहली महिला मुक्केबाज अरुंधति चौधरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, लेकिन उन्हें राज्य सरकार से कोई प्रोत्साहन या शुभकामना संदेश नहीं मिला है। उन्होंने इंग्लैंड की शेंटेले रीड को 5-0 से हराकर महिलाओं के 70 किग्रा वर्ग में यह मेडल जीता।


परिवार का योगदान और प्रेरणा

अरुंधति ने बताया कि यह सफलता उनके परिवार के त्याग और अपने राज्य के लिए कुछ नया करने की प्रेरणा का परिणाम है। ग्लास्गो पहुंचने पर उन्हें पता चला कि वह कॉमनवेल्थ गेम्स में राजस्थान की पहली महिला मुक्केबाज हैं।


राजस्थान में बॉक्सिंग की सुविधाओं की कमी

23 वर्षीय अरुंधति ने एक ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'मेरे लिए यह गर्व की बात थी कि मैं अपने राज्य के लिए पहली महिला मुक्केबाज बनकर मेडल जीत सकी।' उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान में मुक्केबाजी के लिए कोई विशेष सुविधाएं नहीं हैं।


खुद पर निर्भर खिलाड़ी

कोटा जिले की इस खिलाड़ी ने कहा कि वहां के खिलाड़ी अपनी मेहनत से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि कोटा में मुक्केबाजी के लिए कोई विशेष सुविधाएं नहीं हैं, जिसके कारण उन्हें भारतीय सेना से जुड़कर प्रशिक्षण लेना पड़ा।


परिवार का समर्थन

अरुंधति ने अपने परिवार के समर्थन का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पिता ने उनके गोल्ड मेडल जीतने के लिए उपवास रखा था। उन्होंने कहा, 'जब मैंने पहला मुकाबला जीता, तब मेरी बहन ने बताया कि मेरे पिता उपवास रख रहे हैं। इससे मुझे और प्रेरणा मिली।'


फाइनल में बुखार को मात

फाइनल मुकाबले से पहले अरुंधति को तेज बुखार था, लेकिन उन्होंने कहा कि बड़े मंच पर प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को अपनी शारीरिक परेशानियों को पीछे छोड़ना पड़ता है। उन्होंने कहा, 'मैंने फाइनल से पहले बुखार कम करने के लिए पैरासिटामोल लिया, लेकिन रिंग में उतरते ही सब कुछ भूल गई।'