शिक्षा में शॉर्टकट और जुगाड़: एक गंभीर समस्या
शिक्षा का उद्देश्य और समाज की प्राथमिकताएँ
जब समाज में मेहनत के बजाय शॉर्टकट और ईमानदारी के स्थान पर 'जुगाड़' को महत्व दिया जाएगा, तो पेपर लीक जैसी घटनाएँ केवल परीक्षा केंद्रों तक सीमित नहीं रहेंगी। यह धीरे-धीरे एक सामान्य सामाजिक व्यवहार में बदल जाएगा। शिक्षा का असली उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं है, बल्कि मनुष्य और समाज के बीच एक जागरूक और जिम्मेदार संबंध स्थापित करना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में युवाओं के भविष्य को प्राथमिकता देने का आश्वासन दिया है। यह आश्वासन स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल यह है कि यह आश्वासन वास्तविकता में कैसे परिलक्षित होता है? हमें देखना होगा कि स्कूल, कॉलेज और कोचिंग की व्यवस्था इस मानक पर कितनी खरी उतरती है। आज की हलचल केवल तकनीकी गड़बड़ियों की सूची नहीं है, बल्कि यह हमारी सामूहिक नीति और सामाजिक प्राथमिकताओं का परिणाम है।
हाल की घटनाएँ इस मुद्दे को और गंभीर बनाती हैं। उच्च शिक्षा पर वैश्विक बहस चल रही है, जिसमें कई शिक्षाविद 'डेथ ऑफ डिग्री' की बात कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि पारंपरिक डिग्री का महत्व कम हो रहा है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी यह बदलाव देखा जा रहा है। बड़ी कंपनियाँ अब केवल डिग्री पर ध्यान नहीं देतीं, बल्कि यह जानना चाहती हैं कि उम्मीदवार ने क्या बनाया है और वह कैसे सोचता है।
भारत में शिक्षा का विमर्श अब भी मुख्यतः डिग्री, रैंक और सीटों के इर्द-गिर्द घूमता है। ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि देश में शिक्षकों की संख्या एक करोड़ के पार पहुँच गई है। भारत में लगभग 14.7 लाख विद्यालय हैं और 24 करोड़ से अधिक विद्यार्थी इन संस्थानों में पढ़ रहे हैं। यह दर्शाता है कि भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत, छठी से बारहवीं कक्षा तक की शिक्षा को केवल विषय-सूची से नहीं, बल्कि कौशल और जीवन-योग्यताओं से जोड़ा जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी परीक्षा पास करने के साथ-साथ काम करने, समस्या सुलझाने और समाज से जुड़ने की वास्तविक क्षमता लेकर बाहर आएं।
गांधी के विचारों के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री या रोजगार नहीं, बल्कि स्वावलंबी और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है। यह दृष्टि हमें यह सोचने का अवसर देती है कि हमारी डिग्री, परीक्षा और कोचिंग वास्तव में समाज को क्या दे रही हैं।
कोचिंग संस्थान अब मुख्यधारा बन गए हैं। छात्र पहले कोचिंग की तलाश करते हैं और फिर विद्यालय का चयन करते हैं। यह स्थिति शिक्षा की मूल संकल्पना को संकुचित कर देती है। छात्र उत्तर याद करते हैं, लेकिन प्रश्न पूछने की आदत नहीं बनती।
इस प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिक असर गहरा है। असफलता अब जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि स्थायी ठप्पा बन जाती है। सहपाठी सहयोगी से अधिक प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। जब शिक्षा का उद्देश्य एकरेखीय हो जाता है, तो संवेदना और आलोचनात्मक विवेक पीछे हट जाते हैं।
हम अक्सर पेपर लीक की चर्चा करते हैं, लेकिन यह केवल सरकार की विफलता तक सीमित नहीं होनी चाहिए। असल सवाल यह है कि समाज में ऐसी प्रवृत्तियों के लिए मांग कहाँ से आती है। कई विकसित देशों में पेपर लीक जैसी घटनाएँ कम होती हैं, क्योंकि वहाँ समाज में ऐसी मांग नहीं होती।
हमारी स्थिति अलग है। हम कोचिंग संस्थानों पर लाखों रुपये खर्च करने को तैयार हैं। यदि कोई संस्थान यह विश्वास दिलाए कि वह 'अंदर की सेटिंग' करा देगा, तो हम उसके पीछे चल पड़ते हैं। यह स्थिति पेपर लीक को केवल 'अपराध' नहीं, बल्कि एक 'सर्विस' बना देती है।
समस्या दोहरी है। एक ओर हम सरकार से अपेक्षा रखते हैं कि वह धांधली रोके, दूसरी ओर हम स्वयं ऐसी धांधलियों की मांग में हिस्सेदार बन जाते हैं। जब समाज में मेहनत के बजाय शॉर्टकट को महत्व दिया जाएगा, तो पेपर लीक एक सामान्य घटना बन जाएगी। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि समाज के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी बनाना है।
