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सीमा कलिरामना ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में जीता ब्रॉन्ज मेडल

सीमा कलिरामना ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया है। हरियाणा की 27 वर्षीय सीमा, जो एक मां और पीएचडी की छात्रा हैं, ने कठिनाइयों का सामना करते हुए यह उपलब्धि हासिल की। जानें कैसे उन्होंने ठंडे मौसम और प्रारंभिक फाउल थ्रो के बावजूद शानदार वापसी की। उनकी यात्रा, संघर्ष और खेल के साथ पढ़ाई का संतुलन बनाए रखने की कहानी को जानने के लिए पढ़ें।
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सीमा कलिरामना की ऐतिहासिक उपलब्धि

ग्लास्गो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में सीमा कलिरामना ने डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है। हरियाणा की 27 वर्षीय सीमा, जो एक मां और पीएचडी की छात्रा हैं, ने परिवार की जिम्मेदारियों और पढ़ाई के साथ-साथ खेल की कठिन ट्रेनिंग करते हुए यह महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। उन्होंने ठंडे मौसम और प्रारंभिक फाउल थ्रो जैसी चुनौतियों का सामना करते हुए अपने दूसरे और तीसरे प्रयास में 58.65 मीटर की दूरी तक थ्रो फेंका, जिससे उन्हें पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय मेडल मिला।


ग्लास्गो में मुकाबला

ग्लास्गो स्टेडियम में ठंड के कारण खिलाड़ियों को गर्म रहने में कठिनाई हुई। सीमा का पहला थ्रो फाउल हो गया, लेकिन उन्होंने दूसरे प्रयास में 57.32 मीटर की दूरी तय की और तीसरे स्थान पर पहुंच गईं। इसके बाद, उन्होंने तीसरे प्रयास में 58.65 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो फेंका, जो मेडल के लिए पर्याप्त था। अंततः, कैमरून की खिलाड़ी इस आंकड़े को पार नहीं कर पाई, जिससे सीमा का ब्रॉन्ज मेडल सुनिश्चित हो गया। इस प्रतियोगिता में जमैका की खिलाड़ी ने 61.66 मीटर के साथ गोल्ड और कनाडा की खिलाड़ी ने 60.67 मीटर के साथ सिल्वर मेडल जीता। भारत की निधि रानी 57.10 मीटर के थ्रो के साथ चौथे स्थान पर रहीं।


मां बनने के बाद खेल में वापसी

सीमा ने मां बनने के बाद खेल के क्षेत्र में वापसी की है। उनके चार वर्षीय बेटे का नाम रुद्र है। बच्चे के जन्म से पहले उनका सर्वश्रेष्ठ थ्रो 48.08 मीटर था। घर की जिम्मेदारियों के साथ, उन्होंने 2024 में खेल में वापसी की। पिछले महीने भुवनेश्वर में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने 59.73 मीटर का थ्रो फेंककर पहला स्थान प्राप्त किया। सीमा ने बताया कि शुरुआत में प्रैक्टिस करना कठिन था, लेकिन पति और कोच रविंदर कलिरामना की सहायता से उन्होंने अपनी फॉर्म वापस पा ली।


खेल और पढ़ाई का संतुलन

सीमा अपनी पीएचडी की पढ़ाई पर भी ध्यान दे रही हैं। घर की जिम्मेदारियों, बेटे की देखभाल, पढ़ाई और खेल की ट्रेनिंग के बीच संतुलन बनाना उनके लिए आसान नहीं था। फिर भी, उन्होंने हर चुनौती का सामना किया और अपनी पढ़ाई जारी रखी। कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में महिला डिस्कस थ्रो में भारत का यह नौवां मेडल है, और सीमा इस खेल में मेडल जीतने वाली छठी भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। एथलेटिक्स में भारत का यह चौथा मेडल है, इससे पहले सर्वेश कुशारे, श्रीशंकर मुरली और गुलवीर सिंह भी मेडल जीत चुके हैं।


अनुभव का महत्व

सीमा ने बताया कि पिछले साल दक्षिण कोरिया में हुए खेलों से उन्हें जो अनुभव मिला, उससे ग्लास्गो में बहुत मदद मिली। उन्हें अपने बड़े खेलों के दौरान अपने शरीर को फिट रखने की समझ मिली। मैदान पर उतरते समय उनके दिमाग में किसी भी तरह का फालतू दबाव नहीं था। उनका उद्देश्य अपने खेल का आनंद लेना और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना था। यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि लगातार मेहनत से हर कठिनाई को पार किया जा सकता है।