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भारतीय दवा कंपनियों की गुणवत्ता पर उठे सवाल, केन्या में टाटा केमिकल्स को मिला आदेश

भारतीय दवा कंपनियों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, खासकर टाटा केमिकल्स को केन्या में छोड़ने का आदेश मिलने के बाद। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों के उल्लंघन के आरोपों के चलते भारतीय दवा उद्योग की साख पर संकट मंडरा रहा है। हाल के वर्षों में अफ्रीकी देशों में बच्चों की मौतों और बैन दवाओं की तस्करी ने इस उद्योग की प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जानें इस मुद्दे की पूरी कहानी और इसके पीछे के कारण।
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केन्या में टाटा केमिकल्स का संकट

भारत की प्रमुख केमिकल कंपनी टाटा केमिकल्स को केन्या छोड़ने का निर्देश दिया गया है। केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो अपने निर्णय पर अडिग हैं, और बातचीत से भी कोई समाधान नहीं निकल पा रहा है। टाटा केमिकल्स अब केन्या सरकार के साथ नए सिरे से वार्ता करने का प्रयास कर रही है। यह अकेली कंपनी नहीं है, जिसे अफ्रीकी देशों में समस्याओं का सामना करना पड़ा है।


WHO के मानकों का उल्लंघन

भारतीय कंपनियों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित मानकों का उल्लंघन करने के आरोप लगाए गए हैं। यह पहली बार नहीं है, जब ऐसे आरोप सामने आए हैं। भारतीय कफ सिरप कंपनियों को अक्सर आलोचना का सामना करना पड़ता है, जब वे मानकों के अनुरूप कार्य नहीं करतीं।


भारत का फार्मेसी हब

भारत ने हमेशा से दुनिया के लिए एक फार्मेसी हब के रूप में कार्य किया है। लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाइयां भारत में निर्मित होती हैं और ये 200 से अधिक देशों में निर्यात की जाती हैं। हाल के वर्षों में, अफ्रीकी देशों में भारतीय दवा कंपनियों के कारण बच्चों की मौतों और बैन दवाओं की तस्करी ने इस उद्योग की प्रतिष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


2022 से अब तक क्या बदला?

2022 में गैंबिया में हरियाणा की मेडन फार्मास्युटिकल्स के कफ सिरप से 69 से 70 बच्चों की मौत का मामला सामने आया था। इसके बाद उज्बेकिस्तान में भी भारत में निर्मित कफ सिरप से 68 बच्चों की जान गई और 2023 में कैमरून में 12 बच्चों की मौत का कारण भारत में बनी लेकिन ब्रिटेन के लेबल वाली कफ सिरप बताई गई।


कफ सिरप कांड की गंभीरता

WHO की जांच में गैंबिया में हुई मौतों से जुड़े कफ सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल जैसे जहरीले रसायन पाए गए थे। WHO ने बताया कि इनकी मात्रा निर्धारित सीमा से 200 गुना अधिक थी। हालांकि, भारतीय नियामकों ने इन रसायनों की मौजूदगी से इनकार किया, जबकि गैंबिया की संसदीय समिति ने मेडन फार्मास्युटिकल्स को जिम्मेदार ठहराया।


बच्चों की मौतों का मामला

पिछले साल भारत में भी कोल्ड्रिफ, रेस्पिफ्रेश टीआर और रीलाइफ सिरप के कारण मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा समेत कई राज्यों में 24 बच्चों की मौत हुई थी। जांच में कोल्ड्रिफ में लगभग 50 प्रतिशत तक डाइएथिलीन ग्लाइकॉल पाया गया था, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।


तस्करी की नई चुनौती

कफ सिरप के अलावा, हाल के महीनों में एक नई समस्या सामने आई है, जिसमें भारतीय फार्मा कंपनियां टापेंटाडोल और कैरिसोप्रोडोल के मिश्रण वाली दर्द निवारक दवाएं पश्चिम अफ्रीकी देशों में भेज रही हैं। यह मिश्रण नशे की लत लगाने वाला और सांस रोकने वाला माना जाता है, जिसे भारत ने फरवरी 2025 में बैन कर दिया था।


तस्करी का मामला

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई की एवियो फार्मास्युटिकल्स और उसकी सहयोगी कंपनी वेस्टफिन इंटरनेशनल इन दवाओं की भारी मात्रा में तस्करी कर रही थीं। इसके बाद भारत के ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ने इस दवा के निर्माण और निर्यात की सभी अनुमतियां रद्द कर दीं और मुंबई के प्लांट पर छापेमारी कर सारा स्टॉक जब्त किया।


बैन के बावजूद तस्करी

एक अन्य जांच के अनुसार, भारत के बैन लगाने के बाद भी 60 से अधिक भारतीय फार्मा सप्लायरों ने लगभग 130 मिलियन डॉलर मूल्य की सिंथेटिक ओपिओइड गोलियां पश्चिम अफ्रीकी देशों को भेजीं। अधिकांश मामलों में इन देशों ने इन दवाओं को मंजूरी भी नहीं दी थी। पीआरजी फार्मा का नाम सामने आया है, जिसके निदेशक मेडन फार्मास्युटिकल्स से जुड़े हैं।


गुणवत्ता पर उठते सवाल

अफ्रीका में हुई इन घटनाओं से पहले भी भारतीय दवा कंपनियां गुणवत्ता को लेकर सवालों में घिरती रही हैं। अमेरिकी दवा नियामक FDA ने पिछले कुछ वर्षों में सन फार्मा, रैनबैक्सी और पॉलीड्रग लैबोरेटरीज समेत कई भारतीय प्लांट से आयात पर रोक लगाई है, जिनमें डेटा में गड़बड़ी और उत्पादन गुणवत्ता से जुड़ी खामियां पाई गई थीं। भारत सरकार ने भी घरेलू स्तर पर सैकड़ों कंपनियों का निरीक्षण कर कई के लाइसेंस निलंबित किए हैं और कुछ के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं।