G7 समिट में PM मोदी का संदेश: भरोसा है आज की सबसे बड़ी संपत्ति
विश्व में भरोसे की कमी पर चिंता
नई दिल्ली: G7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बढ़ते अविश्वास पर चिंता व्यक्त की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उपस्थिति में उन्होंने कहा कि आज की सबसे बड़ी समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि देशों के बीच विश्वास की कमी है।
इवियन में आयोजित आउटरीच सत्र में, जिसका विषय था "नई साझेदारियां बनाना और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को फिर से स्थापित करना", मोदी ने कहा कि देश अब ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, तकनीकी और आर्थिक स्थिरता जैसी चुनौतियों में एक-दूसरे पर पहले से अधिक निर्भर हैं। लेकिन संकीर्ण राष्ट्रीय हितों के कारण वैश्विक सहयोग कमजोर हो रहा है। उन्होंने कहा, "आज दुनिया संसाधनों की कमी से नहीं जूझ रही है। असली कमी भरोसे की है और हमारी साझेदारियों का भविष्य इसी भरोसे पर निर्भर करता है।"
भरोसा: रणनीतिक संपत्ति
भरोसा ही आज की सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति
मोदी ने भरोसे को मौजूदा वैश्विक व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि अब केवल उसकी सीमाओं के भीतर नहीं तय होती।
उनके अनुसार, सफल साझेदारियां केवल भरोसे और विश्वसनीयता पर आधारित होती हैं। उन्होंने कहा, "आज सबसे जरूरी चीज कोई खनिज, तकनीक या बाजार नहीं, बल्कि आपसी भरोसा है।"
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि देशों को यह विश्वास होना चाहिए कि तकनीक और सप्लाई चेन का उपयोग दबाव बनाने के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक भलाई के लिए किया जाएगा। विकास के अवसर सभी देशों के लिए उपलब्ध होने चाहिए और वैश्विक संस्थानों को सभी की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम होना चाहिए।
कोविड-19 का प्रभाव
कोविड ने दिखाया भरोसे की कमजोरी
अपने संबोधन में मोदी ने कोविड-19 महामारी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस संकट ने वैश्विक एकजुटता की कमजोरियों को उजागर किया और आपातकाल में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा, "कई पीढ़ियों की मेहनत से दशकों में बना भरोसा अब कमजोर पड़ रहा है। कोविड ने हमें आईना दिखाया और बताया कि भरोसे और एकजुटता के दावे कितने खोखले साबित हुए।"
मोदी ने कहा कि अगर दुनिया को आगे बढ़ना है, तो देशों को एक-दूसरे पर भरोसा करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि वैश्विक संस्थाएं किसी एक देश या समूह के हित के लिए काम न करें।
