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यमन में हूतियों का राष्ट्रपति भवन पर हमला, सुरक्षा गार्डों की मौत

यमन की अदन में ईरान समर्थित हूतियों ने राष्ट्रपति भवन पर हमला किया, जिसमें दो सुरक्षा गार्डों की मौत हो गई। इस हमले के समय यमन के प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य वहां मौजूद थे, लेकिन वे सुरक्षित रहे। हूतियों ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है और कहा है कि यह सऊदी अरब के ठिकानों पर हमले की उनकी रणनीति का हिस्सा है। 2014 से चल रहे इस संघर्ष में कई जटिलताएँ हैं, और यह हमला यमन में स्थिति को और बिगाड़ सकता है।
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अदन में हुआ हमला

यमन की अंतरिम राजधानी अदन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर हमला किया है। इस हमले में कई मिसाइलें दागी गईं, जिससे दो सुरक्षा गार्डों की जान चली गई। इस घटना के समय यमन के प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य वहां मौजूद थे, लेकिन वे सुरक्षित हैं। सूचना मंत्री मोअम्मर अल-एरियानी ने इस हमले की जानकारी दी और बताया कि हूतियों ने परिसर पर कई मिसाइलें दागी थीं।


हमले की जिम्मेदारी

सूचना मंत्री मोअम्मर अल-एरियानी के अनुसार, हूतियों ने परिसर पर पांच मिसाइलें दागी, लेकिन प्रधानमंत्री और कैबिनेट सदस्य सुरक्षित रहे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वहां मौजूद तीन गवाहों ने महल के आसपास तेज धमाकों की आवाज सुनी। हूती विद्रोहियों ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है।


सऊदी ठिकानों पर भी हमला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हूती विद्रोहियों ने अदन में सऊदी अरब से जुड़े सैन्य मुख्यालय को निशाना बनाया है। उनका कहना है कि सऊदी अरब के ठिकानों पर हमले उनके संगठन की रणनीति का हिस्सा हैं। इससे पहले भी हूती विद्रोही सऊदी अरब के हवाई अड्डों और तेल से जुड़े ठिकानों पर हमले कर चुके हैं। राष्ट्रपति भवन पर हुआ यह हमला यमन में संघर्ष को और बढ़ा सकता है। हूतियों ने कहा है कि उनका लक्ष्य सऊदी सैन्य अभियान से जुड़े ठिकाने थे.


संघर्ष का इतिहास

यमन में संघर्ष 2014 से शुरू हुआ, जब हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। 2015 में, सऊदी अरब के नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करने के लिए हस्तक्षेप किया। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ, जिसके बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई काफी हद तक रुक गई। हालांकि, छह महीने बाद औपचारिक समझौते की अवधि समाप्त होने के बावजूद अनौपचारिक युद्धविराम जारी रहा, लेकिन स्थायी राजनीतिक समाधान की कोशिशें सफल नहीं हो सकीं।