अमेरिका और यूरोप की दोगली नीति: रूस से तेल खरीदने पर प्रतिबंध और खुद का उपयोग
यूएस सेनेट का नया बिल
हाल ही में यूएस सेनेट ने एक नया बिल पारित किया है, जिसके अनुसार यदि कोई देश रूस से तेल खरीदता है, तो अमेरिका को उस पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार होगा। यह भारत और चीन के लिए एक गंभीर खतरा है, क्योंकि ये दोनों देश रूस से बड़ी मात्रा में तेल का आयात करते हैं। लेकिन अब यह सवाल उठता है कि क्या यह बिल वास्तव में गंभीर है। अमेरिका और यूरोप रूस के तेल खरीदने पर अन्य देशों को टैरिफ और आर्थिक प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दे रहे हैं, जबकि खुद वे रूस के रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं।
भारत का रूस से तेल आयात
जुलाई में भारत ने रूस से लगभग 5.5 बिलियन यूरो यानी करीब 55,000 करोड़ रुपये का कच्चा तेल खरीदा। इस महीने में रूस से भारत को तेल की सप्लाई बढ़कर 28 लाख बैरल प्रतिदिन हो गई, जो कि भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 55% है। यह जानकारी सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरए) की रिपोर्ट से प्राप्त हुई है।
रिपोर्ट में खुलासे
सीआरए की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जुलाई में भारत, टर्की, ब्रूनोई और जॉर्जिया की रिफाइनरियों ने कुल 633 मिलियन यूरो के तेल उत्पादों का निर्यात किया। इनमें से 214 मिलियन यूरो के उत्पाद यूरोपीय संघ को भेजे गए, जो रूस के तेल पर प्रतिबंध लगाने की लगातार धमकी देते रहे हैं। इसके अलावा, 184 मिलियन यूरो के उत्पाद ऑस्ट्रेलिया और 234 मिलियन यूरो के उत्पाद अमेरिका को भेजे गए, जिनमें से अनुमानित 284 मिलियन यूरो के रिफाइंड उत्पाद रूस के कच्चे तेल से बने थे।
अमेरिका और यूरोप की दोगली नीति
अमेरिका और यूरोप की बयानबाजी और धमकियों के बावजूद, वे किसी न किसी तरीके से रूस के तेल उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं। यदि वे सच में प्रतिबंध लगाना चाहते हैं, तो उन्हें पहले अपने खुद के उपयोग को रोकना होगा। जुलाई में भारतीय रिफाइनरियों से निकले कार्गो में ऐसे रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद शामिल थे, जिनमें रूस का कच्चा तेल इस्तेमाल हुआ था।
जामनगर रिफाइनरी का योगदान
सीआरए की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई से पहले के तीन महीनों में जामनगर रिफाइनरी के फीड स्टॉक का लगभग 35% हिस्सा रूसी क्रूड था। इसका मतलब है कि भारत न केवल रूस से तेल खरीद रहा है, बल्कि उसे रिफाइन करके तैयार उत्पादों का निर्यात भी कर रहा है। ये उत्पाद अमेरिका और यूरोप के बाजारों में पहुंच रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका और यूरोप खुद रूस के उत्पादों का उपयोग करने में पीछे नहीं हैं।
