ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य पर नया शिपिंग समझौता: क्या बदलेंगे समुद्री मार्ग?
नई दिल्ली में महत्वपूर्ण समझौता
नई दिल्ली: ईरान और ओमान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के संबंध में एक महत्वपूर्ण समझौते पर सहमति जताई है। इस डील के परिणामस्वरूप, अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे तनाव के कारण प्रभावित इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के फिर से खुलने की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, जहाजों की निगरानी और संभावित ट्रांजिट शुल्क पर अभी भी कुछ मुद्दों पर चर्चा जारी है।
नए शिपिंग रूट पर सहमति
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई के अनुसार, तेहरान और मस्कट ने होर्मुज से गुजरने वाले नए शिपिंग कॉरिडोर के भौगोलिक बिंदुओं पर सहमति बना ली है। दोनों देश अब इस व्यवस्था से संबंधित प्रमुख बिंदुओं को शामिल करते हुए एक संयुक्त बयान को अंतिम रूप देने में लगे हैं।
ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने भी बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति की पुष्टि की है। उनके अनुसार, दोनों पक्ष बुनियादी समझौतों तक पहुँच चुके हैं और प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
जहाजों के लिए संभावित परिवर्तन
नई व्यवस्था लागू होने पर खाड़ी में आने-जाने वाले वाणिज्यिक जहाजों को नए समुद्री मार्ग का पालन करना होगा। प्रस्तावित कॉरिडोर का एक बड़ा हिस्सा ईरान के समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरेगा, जबकि कुछ हिस्सा ओमान के समुद्री क्षेत्र में रहेगा।
इससे ईरान को समुद्री यातायात पर पहले से अधिक निगरानी मिल सकती है। हालांकि, जहाजों की जांच और निगरानी की पूरी व्यवस्था किस प्रकार होगी, इस पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
ट्रांजिट शुल्क का मुद्दा
इस डील से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल ट्रांजिट शुल्क का है। बातचीत में जहाजों से शुल्क लेने का मुद्दा उठाया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान कार्गो के मूल्य का लगभग 5 से 7 प्रतिशत शुल्क चाहता है, जबकि ओमान इससे कम, लगभग 3 प्रतिशत शुल्क की बात कर रहा है।
वहीं, अमेरिका चाहता है कि जहाज बिना किसी ट्रांजिट शुल्क के होर्मुज से गुजरें। इस प्रकार, शुल्क को लेकर मतभेद समझौते के रास्ते में एक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकते हैं।
होर्मुज का वैश्विक महत्व
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। इसलिए, यहां शिपिंग व्यवस्था में कोई भी बड़ा बदलाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।
नई व्यवस्था को फिलहाल कुछ महीनों के लिए लागू करने का प्रस्ताव है। हालांकि, इसके सफल संचालन और आगे की बातचीत के आधार पर इसे लंबे समय तक जारी रखा जा सकता है।
