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ईरान का ब्रिक्स में प्रवेश: अमेरिका की आर्थिक नाकेबंदी को चुनौती

ईरान ने ब्रिक्स संगठन में शामिल होकर अमेरिका की आर्थिक नाकेबंदी को चुनौती दी है। यह कदम ईरान को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नई संभावनाएं प्रदान करेगा। जानें कैसे ईरान ने रूस और चीन के साथ मिलकर एक नया गठबंधन बनाया है और भारत की स्थिति इस पूरे घटनाक्रम में क्या है।
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ईरान का नया रणनीतिक कदम

ईरान ने अमेरिकी और पश्चिमी देशों की दादागिरी का सामना करने के लिए ब्रिक्स संगठन का सहारा लेते हुए एक नया योजना तैयार किया है। यह योजना ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच की दुश्मनी कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब से डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में लौटे हैं, उन्होंने ईरान के चारों ओर एक कठोर आर्थिक दीवार खड़ी कर दी है। इसे आर्थिक नाकेबंदी कहा जाता है। अमेरिका ने अन्य देशों को चेतावनी दी है कि वे ईरान से तेल न खरीदें, अन्यथा उन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। इसके अलावा, ईरान को अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली, जिसे स्विफ्ट कहा जाता है, से बाहर कर दिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि ईरान न तो अपना तेल बेच पा रहा था और न ही वैश्विक व्यापार में अपनी मुद्रा का उपयोग कर पा रहा था।


ईरान की नई रणनीति

अमेरिका का उद्देश्य ईरान को इतना कमजोर करना था कि वह आत्मसमर्पण कर दे। लेकिन ईरान ने समझ लिया कि अकेले अमेरिका का सामना करना कठिन है। इसलिए, उसने उन देशों से हाथ मिलाया है जो खुद अमेरिका की नीतियों से असंतुष्ट हैं। जनवरी 2024 में, ईरान ब्रिक्स का स्थायी सदस्य बन गया। लेकिन असली मास्टर स्ट्रोक तब आया जब ईरान ने न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) का हिस्सा बनने का निर्णय लिया। इससे ईरान अब रूस के साथ रूबल, चीन के साथ युआन और भारत के साथ रुपये में व्यापार कर सकेगा। इसका मतलब है कि अमेरिकी डॉलर का प्रभाव कम हो जाएगा।


त्रिकोणीय गठबंधन का उदय

अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार, डॉलर, अब ईरान के लिए ब्रिक्स के माध्यम से कमजोर हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक मजबूत त्रिकोणीय गठबंधन काम कर रहा है, जिसमें रूस, चीन और ईरान शामिल हैं। चीन ईरान से सस्ते तेल की बड़ी मात्रा में खरीदारी कर रहा है और इसके बदले में ईरान को तकनीकी सहायता और वित्तीय मदद दे रहा है। वहीं, रूस ने ईरान के साथ मिलकर एक नया बैंकिंग संदेश प्रणाली विकसित किया है, जिससे उन्हें पश्चिमी देशों के स्विफ्ट सिस्टम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके अलावा, दोनों देश एक नया रेल कॉरिडोर भी बना रहे हैं, जिससे रूस का सामान ईरान के माध्यम से सीधे एशिया तक पहुंच सकेगा।


भारत की स्थिति

इस पूरे घटनाक्रम में भारत की स्थिति महत्वपूर्ण है। एक ओर, भारत का पुराना मित्र ईरान है, जहां वह चाबहार पोर्ट का निर्माण कर रहा है। यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से भारत बिना पाकिस्तान के सीधे अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक पहुंच सकता है। हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चाबहार पोर्ट के विकास पर असर पड़ा है। भारत पर भी दबाव है कि वह ईरान से दूरी बनाए रखे। लेकिन भारत की विदेश नीति काफी चतुराई से काम कर रही है। भारत ने ईरान के साथ एक अस्थायी कार्यकारी रास्ता निकाला है, जिससे उसका निवेश सुरक्षित रहे और अमेरिका भी ज्यादा नाराज न हो।