ईरान के बाद इस्लामिक नाटो में मिस्र की भूमिका पर सवाल
इस्लामिक नाटो का गठन और मिस्र की स्थिति
ईरान के अमेरिका के साथ संघर्ष के बाद, एक इस्लामिक नाटो का गठन हुआ है। हालांकि, इस प्रक्रिया में मिस्र, जिसने इस दिशा में काफी प्रयास किए, पीछे रह गया है। जून में काहिरा में इस्लामिक नाटो को लागू करने के लिए एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें मिस्र ने तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब को एक समूह बनाने के लिए प्रेरित किया। लेकिन जब मक्का में समझौता हो रहा था, तब मिस्र का कोई उल्लेख नहीं था। मिस्र और उसके राष्ट्रपति अब्दुल फताह अलसीसी हमेशा से ऐसे गठबंधनों में सक्रिय रहे हैं। 1967 के युद्ध में इजराइल के हाथों अपने क्षेत्र को खोने के बाद, मिस्र ने अपनी रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समझा है।
यदि मिस्र तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के गठबंधन में शामिल होता, तो यह उसके लिए अधिक खतरा बन सकता था, क्योंकि इजराइल की सीमा उसके निकट है।
इजराइल और मिस्र के बीच की जटिलता
इजराइल की सीमा पाकिस्तान या सऊदी अरब से नहीं लगती, लेकिन मिस्र के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय है। यदि फिलिस्तीन में कोई संकट उत्पन्न होता है, तो वहां से भागने वाले लोग मिस्र की ओर रुख करेंगे, जिससे वहां एक नया संकट खड़ा हो सकता है। इसीलिए, मिस्र ने एक बुद्धिमान निर्णय लिया है और किसी भी रणनीतिक गठबंधन का हिस्सा नहीं बना है, क्योंकि वह इजराइल के साथ दुश्मनी नहीं चाहता।
सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच रक्षा समझौता, जिसे इस्लामिक नाटो कहा जा रहा है, कई कारणों से हुआ है। जानकारों का मानना है कि अमेरिका-इजराइल-ईरान के बीच बढ़ते तनाव और ईरान की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन इस समझौते के पीछे मुख्य कारण हैं।
नई विश्व व्यवस्था का उदय
सऊदी अरब के राजनीतिक वैज्ञानिक मंसूर अल-मरज़ोकी ने कहा कि मक्का समझौता एक नई विश्व व्यवस्था की ओर एक प्रारंभिक कदम है। यह तीन मध्यम-स्तरीय शक्तियों को एकजुट करने का एक ढांचा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या अंकारा का यह कदम अमेरिका और नाटो की विश्वसनीयता पर संदेह को दर्शाता है।
नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की पूर्व अधिकारी तारा कार्था ने बताया कि एक अमेरिकी कांग्रेस सदस्य ने कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मक्का समझौते को स्थापित करने में मदद की थी।
