ऑस्ट्रेलिया-फिजी सुरक्षा समझौता और भारत के लिए यूरेनियम सप्लाई का रास्ता
दक्षिण प्रशांत महासागर में ऑस्ट्रेलिया और फिजी के बीच एक महत्वपूर्ण सुरक्षा समझौता हुआ है, जिसे 'वाले यूनियन' कहा जा रहा है। इस समझौते का भारत के लिए विशेष महत्व है, क्योंकि इससे भारत को यूरेनियम की सप्लाई का रास्ता साफ हो रहा है। यह डील भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी और उसे परमाणु ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करेगी। जानें इस समझौते के पीछे की राजनीति और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
| Jul 6, 2026, 14:12 IST
दक्षिण प्रशांत महासागर में नया खेल
दक्षिण प्रशांत महासागर की नीली लहरों के बीच एक महत्वपूर्ण खेल की शुरुआत हो चुकी है। यह खेल कैनबरा में शुरू हुआ है, जिसकी गूंज बीजिंग तक सुनाई देगी, और इसका लाभ भारत की राजधानी नई दिल्ली को मिलने वाला है। इस खबर के दो प्रमुख पहलू हैं। पहला, ऑस्ट्रेलिया और फिजी के बीच एक ऐतिहासिक सुरक्षा समझौता हुआ है, जिसे 'वाले यूनियन' कहा जा रहा है। दूसरा, भारत को यूरेनियम की सप्लाई का रास्ता साफ हो रहा है, जिसका भारत दशकों से इंतजार कर रहा था। इस सप्ताह होने वाली उच्च स्तरीय बैठकों से न केवल ऑस्ट्रेलिया की रक्षा नीति में बदलाव आएगा, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा भी बदल जाएगी।
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री की फिजी यात्रा
द ऑस्ट्रेलियन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीस सोमवार को फिजी पहुंचेंगे। वहां, वह अपने फिजाई समकक्ष के साथ 'वाले यूनियन' पर हस्ताक्षर करेंगे। 'वाले' फिजीआई भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है परिवार। हालांकि, राजनीति में इस परिवार का अर्थ बहुत गहरा है। यह समझौता ऑस्ट्रेलिया के उस प्रयास का हिस्सा है, जिसके तहत वह पापुआ न्यूगिनी, तवालू, नोरू और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ अपनी सुरक्षा साझेदारी को मजबूत कर रहा है। याद करें कि 2022 में चीन ने सोलमन आइलैंड्स के साथ एक गुप्त सुरक्षा समझौता किया था, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। तब से ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका चिंतित हैं कि चीन इन छोटे द्वीपों में अपने सैन्य ठिकाने स्थापित कर सकता है। फिजी के साथ होने वाला यह नया समझौता ऑस्ट्रेलिया को फिजी की सुरक्षा और पुलिसिंग में महत्वपूर्ण भूमिका देगा। यदि फिजी की सुरक्षा को कोई खतरा होता है, तो ऑस्ट्रेलिया वहां सैन्य और तकनीकी सहायता भेजने वाला पहला देश होगा। यह सीधे तौर पर चीन के पेसिफिक विस्तार पर एक ब्रेक लगाने जैसा होगा।
भारत के लिए यूरेनियम डील का महत्व
मेलबर्न में प्रधानमंत्री मोदी और पीएम अल्बनीस की मुलाकात होने वाली है। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देश यूरेनियम निर्यात समझौते को अंतिम रूप दे सकते हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम की कहानी में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। ऑस्ट्रेलिया के पास लगभग 30% यूरेनियम भंडार है, लेकिन लंबे समय तक उसने भारत को यूरेनियम देने से मना कर दिया था, क्योंकि भारत ने परमाणु प्रसार संधि एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। 2008 में भारत को परमाणु व्यापार के लिए विशेष छूट मिलने के बाद रास्ते खुले। 2014 में पूर्व पीएम टोनी एबॉट ने भारत के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए, लेकिन तकनीकी मुद्दे हमेशा अड़चन बने रहे। सबसे बड़ी समस्या सुरक्षा मानकों की थी। ऑस्ट्रेलिया चाहता था कि उसका यूरेनियम केवल नागरिक परमाणु ऊर्जा के लिए उपयोग हो, न कि हथियारों के लिए। अब रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों ने इस तकनीकी मुद्दे को सुलझा लिया है, जिसका अर्थ है कि अब कागजी कार्रवाई खत्म हो चुकी है और जल्द ही भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की सप्लाई शुरू होने वाली है।
भारत की ऊर्जा जरूरतें
भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है, और इसके लिए उसे भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता है। वर्तमान में, भारत अपनी अधिकांश बिजली कोयले से उत्पन्न करता है, जिससे प्रदूषण होता है। भारत ने लक्ष्य रखा है कि 2070 तक वह नेट जीरो उत्सर्जन करने वाला देश बनेगा। इसके लिए, उसे कोयले को छोड़कर परमाणु ऊर्जा की ओर बढ़ना होगा। भारत में वर्तमान में 22 से अधिक परमाणु रिएक्टर हैं और कई नए रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। इन रिएक्टर्स को चलाने के लिए यूरेनियम की आवश्यकता है। ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाला यूरेनियम भारत के न्यूक्लियर पावर प्लांट्स को नई ऊर्जा प्रदान करेगा, जिससे न केवल सस्ती बिजली मिलेगी, बल्कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। यह डील चीन के लिए भी एक झटका हो सकती है, क्योंकि यह चीन की घेराबंदी का एक हिस्सा है।
