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क्या भारतीय-अमेरिकी मतदाता 2024 में ट्रंप का समर्थन करेंगे या बदलेंगे अपना रुख?

अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का रुख महत्वपूर्ण है। हाल के सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारतीय-अमेरिकियों का डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति जुड़ाव कम हो रहा है, जबकि ट्रंप का समर्थन भी घट रहा है। आव्रजन नीतियों और व्यापारिक संबंधों पर चिंता के चलते मतदाता अपनी पसंद बदल सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय-अमेरिकी मतदाता अब एक समान समूह नहीं हैं, और उनके राजनीतिक विचार भिन्न हैं। क्या ये बदलाव चुनावी परिणामों को प्रभावित करेंगे? जानें पूरी कहानी में।
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अमेरिका में मध्यावधि चुनाव की तैयारी


3 नवंबर को अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती बनते जा रहे हैं। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप के लिए भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का रुख एक नया सवाल बन गया है। क्या जो मतदाता पहले रिपब्लिकन पार्टी की ओर झुके थे, वे इस बार भी उसी के साथ रहेंगे या अपनी पसंद बदलेंगे? भारतीय मूल के मतदाता आमतौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करते आए हैं, इसलिए उनके रुख में बदलाव चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।


सर्वे में राजनीतिक रुझानों का बदलाव

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस द्वारा फरवरी 2026 में किए गए एक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि भारतीय-अमेरिकियों का डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति जुड़ाव कम हुआ है। 2020 में 52 प्रतिशत लोगों ने इस पार्टी से अपनी संबद्धता दिखाई थी, जबकि 2026 में यह आंकड़ा घटकर 46 प्रतिशत रह गया। वहीं, रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ाव 19 प्रतिशत रहा, और 29 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने खुद को निर्दलीय बताया। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि समुदाय की राजनीतिक पहचान अब एक ही पार्टी तक सीमित नहीं है।


ट्रंप का समर्थन घटा

सर्वे में एक और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। 40 वर्ष से कम उम्र के भारतीय-अमेरिकी पुरुषों में ट्रंप का समर्थन 2024 में 40 प्रतिशत से घटकर 2026 की शुरुआत में 24 प्रतिशत रह गया। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ये मतदाता आगामी चुनाव में किस पार्टी को वोट देंगे। कुछ संभवतः डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर लौट सकते हैं, जबकि अन्य निर्दलीय बने रह सकते हैं।


आव्रजन नीति पर चिंता

भारतीय-अमेरिकी समुदाय ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीतियों और एच-1बी वीजा से संबंधित कड़े नियमों को लेकर चिंतित है। यह कार्यक्रम भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिकी कंपनियों में काम करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। वीजा नियमों में सख्ती का असर कर्मचारियों, उनके परिवारों और तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है।


भारत से आने वाले सामान पर लगाए गए टैरिफ भी दोनों देशों के संबंधों में तनाव का कारण बन रहे हैं। कुछ भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं को उम्मीद थी कि ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत संबंधों से द्विपक्षीय रिश्ते मजबूत होंगे, लेकिन व्यापार और आव्रजन के मुद्दों पर मतभेदों ने उन उम्मीदों को चुनौती दी है।


विशेषज्ञों की चेतावनी

राजनीतिक सलाहकार अमित जानी के अनुसार, प्रारंभिक मतदान, पार्टी पंजीकरण और बैलेट की मांग जैसे संकेत डेमोक्रेटिक पार्टी के उत्साह को समझने में मदद कर सकते हैं। लेकिन ये यह साबित नहीं करते कि मतदाता वास्तव में किस उम्मीदवार को वोट देंगे। दक्षिण एशियाई समुदाय से जुड़ी नेहा दीवान ने भी कहा कि डेमोक्रेटिक मतदाता अक्सर जल्दी मतदान करते हैं, इसलिए शुरुआती आंकड़ों को अंतिम जनादेश मानना उचित नहीं होगा।


भारतीय-अमेरिकी मतदाता की विविधता

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय में उम्र, लिंग, जन्मस्थान और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विचार भिन्न हैं। महंगाई, परिवारों की आर्थिक चुनौतियां और आव्रजन प्रवर्तन की कार्रवाइयां भी मतदाताओं की चिंताओं को प्रभावित कर सकती हैं। इस समय यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारतीय-अमेरिकी मतदाता सामूहिक रूप से ट्रंप से दूरी बना चुके हैं। सर्वेक्षण और प्रारंभिक मतदान के संकेत बदलते रुझान की ओर इशारा करते हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर मतदान और परिणामों के बाद ही स्पष्ट होगी।