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चीन की 'ट्विन स्ट्रैटेजी': तिब्बत में सांस्कृतिक विरासत का विनाश और सैन्य तैयारी

भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों में छिपे खतरों का खुलासा करते हुए, यह लेख चीन की 'ट्विन स्ट्रैटेजी' पर प्रकाश डालता है। तिब्बत में सांस्कृतिक विरासत के विनाश और सैन्य तैयारी के लिए बनाए जा रहे 'डबल-यूज' इंफ्रास्ट्रक्चर की जानकारी दी गई है। इसके अलावा, 'रेड टूरिज्म' के तहत सांस्कृतिक पहचान को मिटाने के प्रयासों और भारत के लिए जल-सुरक्षा से जुड़े खतरों का भी विश्लेषण किया गया है।
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भारत-चीन संबंधों में छिपा खतरा


नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंध भले ही सामान्य दिखते हों, लेकिन सीमा पर हालात चिंताजनक हैं। चीन, जो कूटनीतिक स्तर पर शांति का दिखावा कर रहा है, तिब्बत के पठार पर अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए खतरनाक 'ट्विन स्ट्रैटेजी' पर काम कर रहा है। हालिया खुफिया रिपोर्टों और उपग्रह चित्रों से यह स्पष्ट हुआ है कि चीन तिब्बती बौद्ध धर्म और सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट करने में लगा है, जबकि पर्यटन और विकास के नाम पर ऐसे बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है, जिसे आपातकाल में सैन्य उपयोग के लिए तुरंत सक्रिय किया जा सके।


'डबल-यूज' इंफ्रास्ट्रक्चर की सच्चाई

भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि तिब्बत में चल रही परियोजनाएं केवल शहरीकरण या पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नहीं हैं। ग्रामीण विकास, राजमार्गों, खेल परिसरों और पर्यटन स्थलों के नाम पर जो ढांचा तैयार किया जा रहा है, वह 'द्वि-उपयोग' (Dual-Use) क्षमता से लैस है। इसका अर्थ है कि शांति के समय में नागरिकों और पर्यटकों के लिए उपयोग होने वाला यह ढांचा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव के समय पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के सैनिकों और सैन्य संसाधनों की त्वरित तैनाती के लिए सक्रिय किया जा सकता है।


'रेड टूरिज्म' का खेल

पूर्वी तिब्बत के खाम क्षेत्र में ड्रैगो काउंटी के सेंगडेंग गांव में सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का एक ताजा उदाहरण देखने को मिला है। मीडिया रिपोर्टों और उपग्रह चित्रों के अनुसार, एक समय स्थानीय लोगों द्वारा पूजनीय 99 फुट ऊंची बुद्ध मूर्ति को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। 1973 के भूकंप के बाद स्थानीय दान से बनी इस धार्मिक धरोहर को अब 'ड्रैगो काउंटी रेड आर्मी कैवेलरी डिवीजन रेसकोर्स' में बदल दिया गया है। 2023 के बाद से, स्थानीय प्रशासन इस स्थान का उपयोग कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचार और सैन्य-सांस्कृतिक उत्सवों के लिए कर रहा है, जिसे चीनी सरकार 'रेड टूरिज्म' का नाम दे रही है।


भारत के लिए जल-सुरक्षा और रणनीतिक खतरे

तिब्बत पर चीन का नियंत्रण केवल भूमि तक सीमित नहीं है। तिब्बती पठार एशिया के प्रमुख जल स्रोतों का केंद्र है, जहां से ब्रह्मपुत्र, सिंधु और सतलुज जैसी नदियां निकलती हैं। पारंपरिक तिब्बती बस्तियों को विस्थापित कर विशाल बांधों और सरकारी केंद्रों की स्थापना से बीजिंग को भारत और बांग्लादेश जैसे देशों के खिलाफ 'वॉटर वेपन' का उपयोग करने की क्षमता मिलती है। इसके अलावा, चीन अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'तिब्बत' की ऐतिहासिक पहचान को खत्म करने के लिए 'शिजांग' (Xizang) शब्द का उपयोग करने पर जोर दे रहा है।


चीन की रणनीति का एक गंभीर पहलू तिब्बती पठार के जनसांख्यिकीय संतुलन को बिगाड़ना भी है। शैक्षणिक प्रणाली में भी बदलाव किया जा रहा है, जहां तिब्बती भाषा की जगह 'पुतोंगहुआ' (मंदारिन चीनी) को अनिवार्य किया जा रहा है।